फव्वारे की होगी कार्बन डेटिंग, अगली सुनवाई 11 अक्टूबर को
प्रादेशिक डेस्क
वाराणसी। काशी में ज्ञानवापी मस्जिद में मौजूद फव्वारा शिवलिंग है या नहीं, इसको लेकर कोर्ट में सुनवाई जारी है। आज फव्वारे की कार्बन डेटिंग को लेकर जिला कोर्ट का आदेश आ चुका है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि वह इस मामले में कुछ स्पष्टीकरण चाहते हैं और अगली डेट 11 अक्टूबर की दी है। इस बीच एक शब्द बहुत ज्यादा चर्चा में आ चुका है, वह है कार्बन डेटिंग। आइए आपको बताते हैं आखिर क्या है कार्बन डेटिंग? साइंटिफिक जॉर्नल नेचर में प्रकाशित रिसर्च पेपर के मुताबिक सभी लिविंग ऑब्जेक्ट्स अपने आस-पास के वातावरण से कार्बन एब्जॉर्ब करते हैं। इसमें सी-14 नाम का प्राकृतिक और रेडियोएक्टिव कार्बन की मात्रा भी शामिल होती है। सभी तो नहीं, लेकिन कुछ आइसोटेप्स में एक अस्थिर नाभिक होता है। यानी यह अस्थिर आइसोटोप प्रोटॉन, न्यूट्रॉन या दोनों की संख्या बदल देगा। समय के साथ इस बदलाव को रेडियोधर्मी क्षय कहा जाता है। फिलहाल जिंदा जीव वायुमंडल में मौजूद सी-14 का गठन करेगा। वहीं बहुत ज्यादा पुराने मृत स्रोतों ने सभी को खत्म कर दिया होगा।
इस तरह सी-14 के आधार पर किसी ऑर्गेनिक ऑब्जेक्ट की उम्र तय की जा सकती है। इसके तहत 5730 साल पुराने सैंपल की भी उम्र पता की जा सकती है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित शोधपत्र में कहा गया है कि जब किसी पौधे या पशु की मृत्यु होती है, वह कार्बन एब्जॉर्ब करना बंद कर देता है। लेकिन चूंकि कार्बन-14 या सी-14 एक रेडियोएक्टिव कार्बन है, इसकी संचित मात्रा का क्षय होता रहता है। लगातार क्षय होता कार्बन-14 एक टाइम कैप्सूल बनाता है। कार्बन डेटिंग के जरिए वस्तु पर बचे रेडियोएक्टिव की मात्रा को जांचा जाता है। इसके बाद यह तय किया जाता है कि अमुक चीज कितने वक्त पुरानी है। हालांकि जियोलॉजिस्ट चट्टानों की उम्र तय करने के लिए कार्बन डेटिंग तकनीक का इस्तेमाल नहीं करते। इसके लिए ऑर्गेनिक मैटीरियल की मौजूदगी जरूरी है। डॉ. क्रिस्टोफर एस बेसर्ड, जो कि पश्चिमी टेक्सास एएंडएम यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर हैं, बताते हैं कि कार्बन डेटिंग केवल उन ऑब्जेक्ट्स की हो सकती है, जिनकी उम्र 50 हजार साल से कम है। इसलिए इस तकनीक का इस्तेमाल, केवल पेड़ों, पौधों और जानवरों की उम्र का पता लगाने में होता है, क्योंकि यह आमतौर पर 50 हजार साल से कम के होते हैं। अब चूंकि कार्बन डेटिंग के लिए सी-14 तत्व का होना जरूरी है। लेकिन अगर चट्टान में यह तत्व नहीं मिलता है तो फिर उस पर मौजूद रेडियोएक्टिव आइसोटेप के आधार पर इसकी उम्र का पता लगाया जा सकता है। बता दें कि रेडियोमीट्रिक डेटिंग के जरिए चट्टानों की उम्र का पता लगाया जा सकता है।
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