Sunday, February 8, 2026
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राजनीति में उचित समय का महत्व

जानकी शरण द्विवेदी

कहते हैं कि मानव जीवन में उचित समय का बहुत महत्व है। कई बार हम उचित समय न होने के कारण अच्छा फैसला लेकर भी खलनायक बन जाते हैं। और राजनीति में तो उचित समय एक ऐसा कारक है जो किसी नेता या पार्टी को सफलता की ऊंचाइयों तक ले जा सकता है या असफलता के गर्त में धकेल सकता है। सही समय पर लिया गया निर्णय न केवल जनता का भरोसा जीतता है, बल्कि सियासी रणनीति को भी मजबूत करता है। बिहार के हालिया तेज प्रताप निष्कासन मामले को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि लालू प्रसाद यादव ने बेटे तेज प्रताप को निष्कासित करने का फैसला बिहार विधानसभा चुनाव से पहले क्यों लिया। यह कदम तेजस्वी यादव की छवि को बचाने और पार्टी की साख को बनाए रखने के लिए सटीक समय पर उठाया गया।

उचित समय का महत्व क्यों?

जनता की नब्ज पकड़ना
राजनीति में जनता की भावनाओं और जरूरतों को समझना जरूरी है। सही समय पर उठाया गया कदम जनता के बीच सकारात्मक संदेश देता है। उदाहरण के लिए, संकट के समय त्वरित राहत घोषणाएं सरकार की सक्रियता दिखाती हैं। अगर यही घोषणा देर से हो, तो जनता का भरोसा टूट सकता है।

चुनावी रणनीति में टाइमिंग
चुनावी साल में हर कदम का समय महत्वपूर्ण होता है। तेज प्रताप निष्कासन का फैसला बिहार चुनाव से पहले इसलिए लिया गया, क्योंकि तेज प्रताप की वायरल पोस्ट और तलाक विवाद से तेजस्वी की छवि को नुकसान हो सकता था। लालू ने सही समय पर यह कठोर कदम उठाकर तेजस्वी को सियासी नुकसान से बचाया।

विपक्ष को जवाब देने की रणनीति
सही समय पर जवाबी हमला या रक्षात्मक कदम विपक्ष की रणनीति को कमजोर करता है। तेज प्रताप निष्कासन के बाद जीतन राम मांझी जैसे नेताओं ने राजद पर हमला बोला, लेकिन लालू का यह फैसला पहले ही विपक्ष के तंज को कुंद करने वाला था।

पार्टी की एकता और छवि
उचित समय पर लिए गए अनुशासनात्मक फैसले पार्टी की एकता को बनाए रखते हैं। तेज प्रताप निष्कासन से राजद ने यह संदेश दिया कि मर्यादा और नैतिकता सर्वोपरि है, जो कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच सकारात्मक प्रभाव डालता है।

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उचित समय का महत्व के उदाहरण

आपको कुछ उदाहरणों से उचित समय का महत्व समझाने की कोशिश करते हैं।

नरेंद्र मोदी की रणनीति : 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने सही समय पर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को उठाया। नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदमों की टाइमिंग ने उनकी मजबूत नेतृत्व की छवि बनाई।

ममता बनर्जी की रणनीति : पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के भ्रष्टाचार के आरोपों पर तुरंत कार्रवाई की, जिससे उनकी पार्टी की छवि बची।

गलत समय का नुकसान

गलत समय पर लिया गया सही फैसला भी सियासी नुकसान पहुंचा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर लालू ने तेज प्रताप निष्कासन का फैसला चुनाव के बाद लिया होता, तो तेजस्वी की छवि को पहले ही नुकसान हो चुका होता। इसी तरह, 2002 के गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन सरकार की देरी से कार्रवाई ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया था। यह कहना कि तेज प्रताप के प्यार के ऐलान का चुनाव बाद कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन पूरी तरह सटीक नहीं।

  1. तेजस्वी की छवि पर प्रभाव
    तेज प्रताप की वायरल पोस्ट और उनके तलाक विवाद ने राजद की छवि को नुकसान पहुंचाने का खतरा पैदा किया था। बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे हैं। उनकी सियासी विश्वसनीयता और युवा नेतृत्व की छवि पर तेज प्रताप की हरकतों का असर पड़ सकता था। अगर यह ऐलान चुनाव बाद होता, तो शायद तेजस्वी की छवि को तत्काल नुकसान नहीं होता, क्योंकि तब तक मतदाता अपने वोट डाल चुके होते। इस लिहाज से, चुनाव बाद ऐलान का तात्कालिक सियासी नुकसान कम हो सकता था।
  2. पार्टी की एकता और मर्यादा
    लालू प्रसाद यादव ने तेज प्रताप निष्कासन को पार्टी की मर्यादा और सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ा। उन्होंने कहा कि तेज प्रताप का व्यवहार परिवार और पार्टी के मूल्यों के खिलाफ है। अगर यह पोस्ट चुनाव बाद आई होती, तो भी लालू को कार्रवाई करनी पड़ती, क्योंकि राजद की छवि सामाजिक न्याय और नैतिकता पर टिकी है। लेकिन, चुनाव बाद ऐसा फैसला लेना उतना त्वरित या कठोर नहीं होता, क्योंकि सियासी दबाव कम होता। इस तरह, तेज प्रताप निष्कासन का प्रभाव कम हो सकता था।
  3. विपक्ष को मौका
    चुनाव से पहले तेज प्रताप की पोस्ट ने विपक्ष को राजद और लालू परिवार पर हमला करने का मौका दिया। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इसे परिवारवाद और नैतिकता के अभाव से जोड़ा। अगर यह घटना चुनाव बाद हुई होती, तो विपक्ष के पास इस मुद्दे को भुनाने का समय कम होता। मतदाताओं के बीच इस विवाद का प्रभाव सीमित रहता, और तेज प्रताप निष्कासन शायद इतना चर्चा का विषय नहीं बनता।
  4. क्या कोई फर्क नहीं पड़ता?
    यह कहना कि चुनाव बाद ऐलान से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, पूरी तरह सही नहीं है। भले ही तात्कालिक सियासी नुकसान कम होता, लेकिन तेज प्रताप का व्यवहार और उनकी पोस्ट राजद की दीर्घकालिक छवि को प्रभावित करती। लालू परिवार की एकता और नैतिकता पर सवाल उठते, जो भविष्य में तेजस्वी के नेतृत्व को कमजोर कर सकते थे। तेज प्रताप निष्कासन का यह फैसला चुनाव से पहले इसलिए जरूरी था, क्योंकि यह तेजस्वी को सियासी रूप से मजबूत करने और विपक्ष के हमलों को रोकने की रणनीति थी।
  5. तेज प्रताप का हैकिंग दावा
  6. तेज प्रताप ने दावा किया कि उनका सोशल मीडिया अकाउंट हैक हुआ था। अगर यह पोस्ट चुनाव बाद आई होती, तो उनका यह दावा अधिक विश्वसनीय लग सकता था, क्योंकि तब सियासी साजिश का कोण कमजोर पड़ता। चुनाव से पहले विपक्षी दल इसे तेजस्वी को कमजोर करने की रणनीति से जोड़ सकते थे। इस तरह, चुनाव बाद ऐलान से तेज प्रताप निष्कासन की तीव्रता कम हो सकती थी।

जनता की प्रतिक्रिया
चुनाव से पहले तेज प्रताप की पोस्ट ने जनता के बीच चर्चा को जन्म दिया। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा वायरल हो गया, जिससे राजद की छवि पर सवाल उठे। अगर यह घटना चुनाव बाद हुई होती, तो जनता का ध्यान अन्य मुद्दों पर होता, और इस विवाद का प्रभाव सीमित रहता। तेज प्रताप निष्कासन का फैसला शायद इतना सनसनीखेज नहीं होता, क्योंकि तब तक चुनावी नतीजे सामने आ चुके होते।

समय का सही इस्तेमाल कामयाबी की कुंजी
तेज प्रताप निष्कासन का मामला समय (टाइमिंग) के महत्व को रेखांकित करता है। अगर तेज प्रताप ने प्यार का ऐलान चुनाव बाद किया होता, तो इसका तात्कालिक सियासी प्रभाव कम हो सकता था। तेजस्वी की छवि को नुकसान का खतरा कम होता, और विपक्ष को हमला करने का मौका नहीं मिलता। हालांकि, राजद की दीर्घकालिक छवि और परिवार की एकता पर इसका असर पड़ता। लालू का यह कठोर फैसला सही समय पर लिया गया, जिसने तेजस्वी को बिहार चुनाव में मजबूत स्थिति में लाने की कोशिश की। इस तरह, तेज प्रताप निष्कासन ने साबित किया कि राजनीति में समय का सही इस्तेमाल ही सियासी कामयाबी की कुंजी है।

भारत की अर्थव्यवस्था का ग्राफ
संवाद सूत्र भर्ती सूचना

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