चीन यात्रा से क्या भारत को ठोस लाभ मिलेगा?
अमेरिकी टैरिफ में आशातीत वृद्धि से उपजी कड़वाहट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन का दौरा कर उसमें मिठास घोलने का प्रयास किया। वे वहाँ सम्पन्न हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भाग लेकर स्वदेश लौट आए हैं।
खबरों के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ वृद्धि से देश को लगभग 37 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है और 20 लाख नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है। दूसरी ओर, रूस से सस्ते तेल की खरीद से लगभग 17 अरब डॉलर का ही लाभ हुआ, जिसका फायदा मुख्य रूप से तेल कंपनियों के मालिकों को मिला, जनता को नहीं। ऐसे में सवाल यह है कि इस चीन यात्रा से इन नुकसानों की कितनी भरपाई हो पाएगी और भारत को इससे क्या ठोस उपलब्धियाँ मिलेंगी?
यात्रा से मिली उपलब्धियाँ – केवल प्रतीकात्मक?
अब तक जो सामने आया है, उसमें सबसे प्रमुख उपलब्धि पहलगाम आतंकी हमले की निंदा और आतंकवाद पर दोहरे मानदंड न अपनाने की सहमति ही कही जा रही है। हालांकि, इसमें पाकिस्तान का कहीं नाम नहीं लिया गया, जबकि भारत ने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ उसके खिलाफ चलाया था। सच तो यह है कि आतंकवाद का कोई भी देश खुलकर समर्थन नहीं करता, भले ही परोक्ष रूप से उसे बढ़ावा देता हो।
यात्रा की अन्य उपलब्धियाँ मीडिया में मोदी का रेड कारपेट स्वागत, पुतिन और शी जिनपिंग के साथ एक ही कार में बैठना, तथा पुतिन का मोदी को गले लगाना बताई जा रही हैं। किंतु इन सबका कोई प्रत्यक्ष लाभ भारत की जनता को होता नहीं दिख रहा।
इतिहास से सीख
यह पहली बार नहीं है जब भारत-चीन संबंधों में दोस्ती का माहौल दिखा। 1954 में भी दोनों देशों के नेताओं ने पंचशील सिद्धांतों को अपनाया और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा बुलंद किया। लेकिन 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर हमारे भूभाग पर कब्ज़ा कर लिया, जो आज तक वापस नहीं मिल सका।
मोदी के शासनकाल में भी डोकलाम और गलवान जैसी घटनाएँ हुईं। गलवान में तो भारत ने अपने 20 जवानों की शहादत को स्वीकार भी किया। चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश पर दावा ठोंकता है और मैकमोहन रेखा का सम्मान नहीं करता। हालिया भारत-पाक संघर्ष में भी वह खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा दिखा। दुर्भाग्यवश, इन मुद्दों पर कोई ठोस बातचीत इस यात्रा में होती नहीं दिखी। यह दरअसल “दरी के नीचे कूड़ा छिपाने” जैसा प्रतीत होता है।
आर्थिक मोर्चे पर स्थिति
अमेरिकी टैरिफ से हुई क्षति की व्यापारिक भरपाई को लेकर भी कोई ठोस मसौदा सामने नहीं आया। भाजपा और उसका आईटी सेल लंबे समय से चीनी माल के बहिष्कार का आह्वान करते रहे हैं, लेकिन इस बार इस विषय पर भी कोई नया रुख या निर्णय नहीं दिखा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या भारत को अमेरिका और चीन दोनों के उत्पादों का बहिष्कार करना चाहिए या इसमें कोई संतुलित संशोधन लाना चाहिए? इसका निर्णय अंततः सरकार को ही लेना है।
निष्कर्ष
पिछले 75 वर्षों के इतिहास को देखते हुए इस यात्रा से भारत को किसी बड़े ठोस लाभ की संभावना फिलहाल क्षीण ही प्रतीत होती है। बाकी तो दौरों और औपचारिक ‘चाय-पानी की राजनीति’ का सिलसिला चलता ही रहता है।
विदुर नीति का यह श्लोक ऐसे अवसर पर स्मरणीय है –
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसति मूढ़चेता नराधमाः।। अर्थात् जो विश्वास करने योग्य नहीं है, उस पर विश्वास करने वाले मूर्ख और नराधम कहलाते हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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