Tuesday, January 13, 2026
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रक्षाबंधन की ऐतिहासिक कहानियां, रिश्तों की कसौटी

रघोत्तम शुक्ल 

रक्षाबंधन का सम्बन्ध भाई बहन के प्रेम और एक दूसरे के प्रति रक्षात्मक कर्तव्य निर्वहन से है। बहन भाई की कलाई में राखी बाँधकर उसकी मंत्रात्मक रक्षा का प्रबंध करती है तो भाई, बहन की लौकिक रीति से रक्षा का व्रत लेता है। यहाँ हम देखते हैं कि कुछ भारी भरकम व्यक्तित्व वालों ने अपनो बहनों के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया। सबसे पहले हम लेते हैं लोकाभिराम श्रीराम को। उनके एक बड़ी बहन थी शांता, जिसे पिता दशरथ ने बुरे ग्रह नक्षत्रों में जन्म लेने के कारण त्याग कर उपने साढ़ू रोमपाद को दे दिया था,जो अंग देश (वर्तमान भागलपुर) के राजा थे। बड़ी होने पर रोमपाद ने कन्या का विवाह श्रृंगी ऋषि से कर दिया था और वह राजकुमारी वन में पति के साथ अपने आश्रम में रहने लगी। श्रीराम को जब वनवास हुआ तो वे तमाम ऋषि मुनियों से मिले। समाज के निचले पायदान  के निषाद को गले लगाया। भीलिन शबरी के जूठे बेर खाये किंतु बहन शांता की सुधि कभी नहीं ली। अब आते हैं रावण के पास। लक्ष्मण ने उसकी बहन शूर्पनखा के नाक कान काटे थे क्योंकि उसने राम से प्रणय निवेदन किया था। वह पहले अपने भाई खर-दूषण के पास गई, जिन्होंने राम से युद्ध तो किया पर मारे गये। तब वह अन्य भाई रावण के पास गई। रावण ने पहले तो राम लक्ष्मण के आकर्षक व्यक्तित्व के वशीभूत हो कहा कि ‘यद्यपि भगिनी कीन कुरूपा। तदपि न वध लायक सुर भूपा’। हालाकि बाद में उसने सीताहरण की योजना बनाई, युद्ध हुआ और वह कुल सहित मारा गया। श्रीकृष्ण और बलराम की एक बहन थी सुभद्रा।बलराम उसका विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे और श्रीकृष्ण अर्जुन से। श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने रैवतक पर्वत पर हो रही स्त्री पुरुषों की मिश्रित पार्टी से सुभद्रा का हरण करके विवाह कर लिया। बलराम क्रुद्ध होकर बदला लेने के लिये चले,किंतु श्रीकृष्ण ने समझा बुझाकर उन्हें शांत कर दिया। एक अन्य भाई बहन थे रुक्मी और रुक्मिणी। रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थी। रुक्मी उनका विवाह चेदि नरेश शिशुपाल से करना चाहता था जबकि रुक्मिणी श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी। रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के हाथ श्रीकृष्ण के पास प्रेम पत्र भेजकर प्रणय निवेदन किया। वे अति शीघ्र आये और रुक्मिणी का हरण करके विवाह सम्पन्न किया। रुक्मी ने पीछा तो किया किंतु युद्ध में पराजित हो गया था।अब बात करते हैं संसार का नियमन करने वाले महान् शक्तिमान यमराज की, जिनके बारे में गीता भी कहती है कि ‘यमः संयतामहम्।’ यानी भगवान कहते हैं, शासन करने वालों में मैं यम हूँ। तो इन यमराज की एक बहन हैं यमुना जी। एक बार बलराम जी वन में गोप-बालावों के साथ वारुणी का सेवन करके रासरंग कर रहे थे। उनकी इच्छा हुई कि वे यमुना को भी इसमें शामिल करें और उन्हें बुलवाया। यमुना को बलराम की मधुपान अवस्था की जानकारी हो गई थी, अतः वे नहीं गईं। तब बलराम ने अपने हल से उन्हें खींचा। विवश हो वे आई और उनका रंग स्याह पड़ गया। तमाम अनुनय विनय करने पर उन्हें छोड़ा गया। बहरहाल भाई यम ने कुछ भी नहीं किया। एक उदाहरण मेवाड़ की महाराणी कर्मावती और बादशाह हुमायू का भी है। आक्रामक बहादुरशाह से युद्ध करने हेतु महाराणी खुद रणभूमि में कूदी थीं और साथ ही हुमायू को राखी भेजकर रक्षा का आह्वान भी किया था। हुमायू ने इन पवित्र धागों का सम्मान किया और तुरंत दलबल के साथ चले। मगर अफसोस! उन्हें पहुँचने में देर लग गई। मेवाड़ का पतन हो गया और महारानी वीरांगना गति को प्राप्त हो गईं। हुमायू जब पहुँचे तो अपनी इस बहन की चिता को सिज़दा किया और बहादुर शाह को भगाकर मेवाड़ महारानी के पुत्र को सौंप दिया।

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