गति और संभावित देरी की आशंका से वैज्ञानिक समुदाय में बढ़ी चिंता
NISAR Commissioning के धीमे पड़ते चरण ने मिशन की प्रगति को बनाया Uncertain
नेशनल डेस्क
चेन्नई। NISAR उपग्रह मिशन की commissioning प्रक्रिया आखिरकार औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी है, लेकिन इसकी गति और संभावित देरी ने वैज्ञानिकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के ऐतिहासिक सहयोग से विकसित यह उपग्रह बीती 30 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्पेस सेंटर से इसरो के GSLV-F16 रॉकेट के माध्यम से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था।
लॉन्च के बाद उपग्रह को सूर्य समकालिक कक्षा (Sun-Synchronous Orbit) में स्थापित कर दिया गया है, लेकिन अब इसकी commissioning यानी तकनीकी जांच और कक्षीय समायोजन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जो करीब 90 दिनों तक चलेगी।
धीमी प्रक्रिया ने पैदा की चिंताएं
NISAR को लेकर सबसे ज्यादा ध्यान इस समय उसकी commissioning प्रक्रिया की ओर है। नासा के प्राकृतिक आपदा अनुसंधान कार्यक्रम के प्रबंधक गेराल्ड डब्ल्यू बावडेन के अनुसार, उपग्रह को वर्तमान में 737 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया है, जबकि इसका लक्षित कक्षा स्तर 747 किलोमीटर है। इस 10 किलोमीटर के समायोजन में 45-50 दिन का समय लग सकता है।
बावडेन ने बताया कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक उपग्रह की प्रमुख प्रणाली रडार सिस्टम सक्रिय नहीं किया जा सकता। इसका सीधा प्रभाव यह होगा कि NISAR से अपेक्षित पृथ्वी के रीयल टाइम डेटा और इमेज मिलने में विलंब होगा। इससे वैज्ञानिकों की वह योजना भी धीमी पड़ सकती है जिसमें जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिकी और आपदाओं के अध्ययन की तैयारी चल रही थी।
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अंतरिक्ष सहयोग की नई ऊंचाई, लेकिन अनिश्चितता कायम
NISAR मिशन को लेकर इसरो और नासा दोनों ही उत्साहित हैं। बावडेन ने कहा कि यह उपग्रह नासा के इतिहास में सबसे ज्यादा डेटा प्रदान करने वाला मिशन हो सकता है। उन्होंने माना कि इसरो से यह सीखने को मिला कि कैसे विज्ञान को समाज के लाभ में बदला जाए, वहीं इसरो ने नासा से गहन विश्लेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बारीकियां समझीं।

नासा की वैज्ञानिक संघमित्रा बी. दत्ता ने बताया कि भारत और अमेरिका के बीच यह सहयोग भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए मिसाल बन सकता है। भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री की हालिया अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन यात्रा और आगामी मानव अंतरिक्ष मिशन इसकी पुष्टि करते हैं।
NISAR क्यों है खास
NISAR मिशन के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि यह केवल भारतीय नहीं बल्कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसरो ने पहले रिसोर्ससैट और रीसैट जैसे मिशन लॉन्च किए थे जो भारतीय क्षेत्र तक सीमित थे, लेकिन NISAR का लक्ष्य पूरी पृथ्वी का व्यापक अध्ययन करना है।
इस उपग्रह के जरिए हिमालय, अंटार्कटिका, ध्रुवीय क्षेत्रों, महासागरों, वनों और पर्वतीय इलाकों में हो रहे जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग, बर्फ की परतों की स्थिति और पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलावों की निगरानी की जाएगी। इससे न केवल प्राकृतिक आपदाओं की बेहतर भविष्यवाणी की जा सकेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर नीति निर्धारण में भी योगदान मिलेगा।
Commissioning की अनिश्चितता बनी चिंता का कारण
भले ही NISAR मिशन विज्ञान और अंतरिक्ष सहयोग का प्रतीक बन चुका हो, लेकिन इसकी commissioning प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और संभावित बाधाओं से चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। इस प्रक्रिया में तकनीकी अड़चनें आईं तो मिशन से जुड़ी वैज्ञानिक आशाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए यह 90 दिनों का चरण मिशन की सफलता की दृष्टि से अत्यंत निर्णायक माना जा रहा है।
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