मोती बीए जी के रचना हऽ महुआ बारी
‘महुआ बारी’, मोती बीए जी के रचना हऽ। उहां के पहिचान के गीत। इ गीत अपने मधुर लय, काव्य के सुंदरता, सुघरता आ गहिराह सांस्कृतिक सनेस खातिर जानल जाला। कविवर मोती जी, महुआ के पेड़ के केंद्र में राखि के भोजपुरी समाज के जिनिगी, मनोभाव, चुनौती आ दर्शन के बड़ा सहजे ढंग से परोसले बानी। संभवत: एही के चलते पुरनिया लोग अचके एह गीत के आजो इयाद करेला। चर्चा में, बात-बतकही में, एह के रेफर करेला। एह लिहाज से कही तऽ इ लोग के मन-मानस में बसऽल बा। इ बस एगो साहित्यिक रचना भर नइखे, बलुक गँवई जिनिगी आ भोजपुरी संस्कृति के जीवंत चित्र खिंचाइल बा, एहिजा। एकरे लोकप्रियता के अंदाजा एही से लाग जाई कि मोती जी, कहीं काव्य पाठ करे जायीं, तऽ ओहिजा एह गीत के फरमाइश जरूर होखे। सुनइया से लेके मंच पऽ जवन कवि रहसु, सभे एह गीत के सुने बदे लालायित रहे। सँउसे पूर्वांचल के लोक कलाकार एके बड़ा आदर से गावें।
कहे भा बतावे के ना होई कि पहिले नाच-नौटंकी ही मनोरंजन के साधन रहे। मोबाइल आ टीवी के दौर से पहिले। रेडियो पऽ जब इ गीत बाजत भा प्रसारित होखे तब जानकार लोग बतावेला कि लोग कान पात के एकरा के सुने। बाकिर एहू ले खास बात इ बा कि एह में पचास से बेसी अइसन शब्द बा, जवन अब रोज के बोलचाल से गायब बा। एही चलते इ गीत भोजपुरी भाषा के समृद्धि आ सांस्कृतिक धरोहर के समझे खातिर थाती बन गइल बा। खैर, जब हम भोजपुरी के गैरखेमाबाज कवियन के शृंखला लिखे शुरु कइनी, तब्बे से हमार एकदम साफ-सोझ मन बनल कि ‘अनचिन्हार’ कवि लोग के साथे-साथ, भोजपुरी के मशहूर गीतन पऽ भी चर्चा करबऽ। गहमरी जी से लेके चंद्रशेखर मिसिर जी, शैदा जी से लेके अंजन जी तक के कालजयी गीतन पऽ भी एही सीरीज में बात होई। एही सिलसिला में गैरखेमाबाज कवियन के शृंखला के 26वीं कड़ी में आजु मोती जी के सबसे मशहूर रचना ‘महुआ बारी’ पऽ हम तनिका बात करऽब।
बहुत दिन से हम एह रचना के जोहत रहनी हऽ। कहीं, कवनो लेख में दू-चार पंक्ति के उल्लेख भर मिलत रहल हऽ। मन छछनि के रहि जात रहल हऽ। ‘भोजपुरी साहित्यांगन’ पऽ राहगीर जी के संपादन में छपल ‘आधुनिक भोजपुरी कविता और गीतकार’ किताब अपलोड भइल बा, ओही में इ पूरा गीत हमके मिलल रहे। हम तब्बे एह लेख के आधार तइयार कइले रहीं। अबहिन ले कई बेर एह गीत के पढ़ गइनी। महुआ के पेड़, भोजपुरी इलाका में बस एगो पेड़ भर नइखे, बलुक जिनिगी के आधार आ संस्कृति के प्रतीक हऽ। मध्य आ पूरबी भारत के गाँव आ आदिवासी इलाका में इ खूब पावल जाला। एकरे फूल से मादक पेय बनेला। महुआ कहल जाला। ऊ ओह अंचल में कमाई के स्रोत भी बा। एकरे फल के सुखा के बेचल जाला। बड़ा गुणकारी हऽ; इ महुआ। एही से ‘लाटा’ बनेला।
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एकरे कोइना (बीज) के तेल पेराला। घीव जस गाढ़ होखेला, ऊ। एकर लकड़ी, जलावन आ घर-गृहस्थी में पउआ-पाटी-चौखट-जंगला, धरन-बरंगा बनावे के काम आवे ला। अइसना में, महुआ गँवई अर्थव्यवस्था के एगो जरूरी हिस्सा बन जाला। एकरे बिना जिनिगी अधूरा लागेला। संस्कृति के नजरिए से भी एकर महत्व इचिको कम नइखे। होली जइसन पर्व-त्योहार में ‘लाटा’ (पकवान) बनावे के रिवाज रहल बा। महुअर बनेला। पहिले के शादी-बियाह में महुआ के तेल में पूड़ी-दलपूड़ी छनात रहल हऽ। डालडा आ वनस्पति तेल आवे से पहिले के दौर में। लोक मान्यता में महुआ के पेड़ के पवित्र मानल गइल बा। एकरे आसपास कई गो लोक कथा आ लोक विश्वास जनमल। इ तऽ भइल महुआ के बात। बहरहाल, अब हम रउआ सभे के महुआ बारी में ले चलत बानी। फिलहाल एह गीत के देखीं—
‘असो आइल महुआ बारी में बहार, सजनी।
कोंचवाँ मातल भुइयां छूवे,
महुआ रसे रसे चूवे,
जब से बहे भिनुसारे के– बयारि, सजनी ।
असो आइल महुआ बारी में…
पहिले हरकां पछुआ बहलि- झारि गिरवलसि पतवा,
गहना-बीखो छोरि के मुंड़वलसि सगरे मँथवा,
महुआ कुछू नाहीं कहले- जइसन परल, ओइसन सहलें,
तबले झांके लागल पुरुवा दुआरि, सजनी ।
असो आइल महुआ बारी में…
एइसन नसा झोंकलिस कि गदाये लागल पुलुई,
पोरे-पोरे मधू से- भराये लागल से कुरुई,
महुआ एइसन ले रेंगरइलें, जरी पुलुई ले कोंचइलें,
लागल डाढ़ी-डाढ़ी, डोलिया कहांर, सजनी
असो आइल महुआ बारी में…
गड्डी लागल रब्बी के- लदाइल खरीहनवाँ,
दंबरी खातिर ढहले बाड़े डंठवा, किसनवा।
रंस के मातल महुआ डोले, फुलवा खिरकी से मुँह खोले,
घरवां छोड़े के हो गइलिया तयार, सजनी
असो आइल महुआ बारी में…
होत मुन्हारे डलिया-दउरी लेके, गइली सखियाँ !
लोढ़े लगली फुलवा जुड़ावे लगली अँखियाँ
महुआ टप-टप फूल चुवावें, लड़के सेल्हा ले ले धावें,
अब त लागि गइल दूसरे बजार, सजनी ।
असो आइल महुआ बारी में…
कोंचवा के दूधवा गोदना, गोदावेली
से केहू जानी महुआ के लपसी, बनावेली
केहू भेजि दिहल देसावर – केहू, घरे सरावल चाउर
लागल चढ़े उतरे नसा आ खुमार, सजनी !
असो आइल महुआ बारी में…
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सैया खातिर बारी धनियां महुअरि पकावेली
केहू बनिहारे खातिर – तावा पर ततावे ली !
महुआ बैल प्रेम से खावें, गाड़ी खींचे जोत बनावें
ई गरीबवन के किस-मिस अनार, सजनी
असों आइल महुआ बारी में…
ओखरी में मूड़ी डरलें – मूसर से कुटइलें,
लाटा बनिके बाहर अइलें हाथ-हाथें भइलें !
केतना कइले कुरुवानी ! केतना कहीं ई कहानी !
बहे अंखिया से लोहुवा के धार, सजनी
असो आइल महुआ बारी में…
दुनिया खातिर त्यागी भइल – जोगी रूप बनवलें,
आपन सम्पति दूनू हाथे सबके लुटवलें।
जेतना होला ओतना देलें- बदला कुछू नाहीं लेलें,
करो के कलउ में एइसन उपकार, सजनी
असो आइल महुआ बारी में…
नरम नरम हरिअर हरिअर ओढ़ चदरिया,
फेरु से महुआ दुलहा भइलें बन्हले, पगरिया !
जेइसे दिहलें ओइसे पवलें
कवि जी, कविता में ई गवलें
ए संसार में न चलेला उधार, सजनी
असों आइल महुआ बारी में…
जवने हाथे देवऽ पंचे ओ ही हाथ पइबऽ,
जवन जीनिस बोइबऽ तू ओही के ओसइब,
केहू काहें पछताला, केहू काहें घबराला!
एइसन जीनिगी में मिली ना सुतार, सजनी ।
असो आइल महुआ बारी में…
कोंचवाँ मातल भुइयां छूवे महुआ रस रसें चूवे,
जब से बऽहे भिनुसारे के– बयारि,
सजनी असो आइल महुआ बारी में बहार सजनी…’
‘महुआ बारी’ में कविवर मोती जी, महुआ के बहुरूपी स्वरूप के बड़ा सुंदर, मनहर ढंग से देखवले बानी। इ प्रकृति के हिस्सा होखे के साथ-साथ जिनिगी के सुख-दुख, मेहनत आ उत्सव के साथी भी बा। इ गीत, मूलतः गँवई माहौल में महुआ के महत्व के बतावऽता। संगे-संग एकरे ‘किशमिश’ जइसन गुण के बखानो करऽता। इ बात भोजपुरी तक सीमित नइखे। काहेंकि दोसरा इलाकन के लोक साहित्य में भी महुआ के जिक्र मिलेला। जे एकरे असर के देखावे भा बतावेला।
गीत शुरू होला ‘असो आइल महुआ बारी में बहार, सजनी’ से। एही से एगो उमंग के माहौल बनावऽता। इ पंक्ति महुआ के फूलन के खिलल आ बसंत के आवे के सनेस देतिया। इ एगो नया शुरुआत आ उत्साह के प्रतीक बा। ‘कोंचवाँ मातल भुइयाँ छूवे, महुआ रसे रसे चूवे’ में महुआ के कली (कोंच) के जमीन छूवे आ रस टपकत चित्र, अतना जीवंत बा कि सुनइया के मन के आनंद से भर देता। इहाँ ‘कोंचवाँ’ यानी महुआ के फूल आ ‘मातल’ यानी मादकता, प्रकृति के उदारता आ ओकर मनमोहक सुंदरता के देखावऽता। बाकिर इ गीत बस उमंग तक नइखे रुकऽत।
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‘पहिले हरकां पछुआ बहलि- झारि गिरवलसि पतवा’ में पछुआ हवा के कठोर झोंका के जिक्र आवऽता, पछुआ के झकोरा, पतई-पतई झाड़ देता। एहिजा जिनिगी के मुश्किलन के तरफ इशारा भा संकेत बा। जिनिगी में पछुआ हवा के झोंका बही, पतझड़ आई, बाकिर तबो निराश, हताश नइखे होखे के। एहिजा नया पनखी फूटे के उम्मेद बा। असल में एहिजा प्रकृति के सौंदर्य एक तरफ बा, तऽ दूसरे ओकर ओकर उग्र रूप भी बा। इ मनई के जिनिगी के सुख आ संघर्ष के संतुलन देखावऽता। ‘गड्डी लागल रब्बी के-लदाइल खरीहनवाँ, दँबरी खातिर ढहले बाड़े डँठवा, किसनवा’ में किसानन के मेहनत आ खेती के चक्र के दिखाई दिही। ‘रब्बी’ यानी जाड़ा के फसल। ‘खरीहनवाँ’ यानी फसल के दँवनी के ठौर। जहाँ खेत से कटि के गेहूँ भा धान भा सरसो के बोझा आवेला। दँवनी बदे। एकरे माध्यम से खेती-किसानी आ मौसम के चक्र दूनो सोझा आवऽता। अइसने में, ई रचना आनंद, मादकता आ दुख के मिलल-जुलल रंग देखावऽतिया। एकरे यथार्थ आ गहराई से जोड़ऽतिया।
रउआ सभे जनते बानी कि कविता में ‘डिक्शन’ का महत्व का हऽ? कविता में ‘डिक्शन’, छंद आ लय के प्रभावित करेला। दरअसल, कविता में अक्सर कम शब्द में गहन अर्थ आ भावना व्यक्त करे के चुनौती होखेला। एही से कवनो कवि अइसन शब्दन के चुनाव करलन, जवन कविता के मीटर आ राइम स्कीम में फिट होखे। असल में मोती जी, ‘डिक्सन’ के प्रयोग में माहिर रहनी हऽ। भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य के उहाँ के गंभीर अध्येता रहनी हऽ। लोकगीत के रिवाज के मुताबिक ‘महुआ बारी’ के बनावट सरल आ दोहराव वाला बा। इ एह के इयाद रखे आ गावे में आसान बनावऽता। हर अंतरा, ‘असो आइल महुआ बारी में…’ से खत्म होता, जे एगो ‘रेफ्रेन’ जइसन काम करऽता। गीत के एगो खास लय देता। ताकि उ कविता भा गीत सुने में सुखद लागे। इ दोहराव लोकगीतन के उहे खूबी हऽ जवन उनका के सामूहिक गायन आ मौखिक परंपरा में जिंदा राखेला। एह कविता में भोजपुरी के मिठास आ सहजता बा। इ एह के सुनइया के दिल-मन के अउर करीब ले जाता।
कविवर मोती जी, कहीं-कहीं तऽ अलंकार के बढ़िया इस्तेमाल कइले बानी। जइसे, ‘महुआ रसे रसे चूवे’ में ‘र’ ध्वनि के बार-बार आवे से अनुप्रास बनता, जे शब्दन के मधुर बनावऽता। ओही तरे ‘सजनी’ आ ‘छूवे’ जइसन शब्दन में तुकबंदी गीत के संगीतमय लय देता। हर अंतरा छोट आ छंदबद्ध बा, जे गावे में सहज बनऽता। अइसन सहजता आ शिल्प के मेल मोती जी के लोकप्रिय कवि आ गीतकार बनवऽलस। ओहिजे एह रचना में बिम्ब आ सौंदर्य के चित्रण अइसन बा कि खेत-खरिहान-गाँव-गिराँव के माहौल जीवंत हो उठता। ‘एइसन नसा झोंकलिस कि गदाये लागल पुलुई, पोरे-पोरे मधू से-भराये लागल से कुरुई’ में महुआ के फूलन के मादकता आ मधु से भरल चित्र अतना प्रभावी बा कि सुनइया के सामने सुगंधित, रंगीन दृश्य खिंचा जाला। एहिजा ‘पुलुई’ यानी डाल के नाजुक हिस्सा आ ‘कुरुई’ यानी छोट पात्र, पुरान भोजपुरी शब्दन से सांस्कृतिक थाती के जोड़ता।
‘रस के मातल महुआ डोले, फुलवा खिरकी से मुँह खोले’ में महुआ के पेड़ एगो जीवंत मनई जइसन लागऽता, जे हवा में डोलता आ अपने फूलन से प्रकृति के उदारता बिखेरऽता। ‘होत मुन्हारे डलिया-दउरी लेके, गइली सखियाँ! लोढ़े लगली फुलवा जुड़ावे लगली अँखियाँ’ में भोरे-भिनसहरे फूल लोढ़े खातिर निकलल सखियन के समूह के चित्रण भइल बा। गँवई जिनिगी में फूल बाजार में ना किनाला, बिकाला। ओहिजे फुलवारी होखेला, माडर्न अर्थ में गार्डन कह सकत बानी। ओही में सखि-सलेहर फूल लोढ़े जाली। गोस्वामी जी ‘मानस’ में फुलवारी प्रसंग के बड़ा मनहर वर्णन कइले बानी। बाकिर एहिजा मोती जी, जवने ‘डलिया-दउरी’ यानी टोकरी आ ‘लोढ़े’ के जिक्र कइले बानी, उ सामूहिक सहयोग आ प्रकृति से जुड़ाव देखावऽता। इ बिम्ब खाली आँखी के सोझे लाइव तस्वीर नइखे खिंचत बलुक सुनइया के फुलवारी के माहौल के हिस्सा बनावऽता।
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‘महुआ बारी’ में एगो गहिराह दार्शनिक आधार बा। इ गँवई जिनिगी के अनुभव से उपजल बा। ‘जेतना होला ओतना देलें-बदला कुछू नाहीं लेलें’ में महुआ के पेड़ के निःस्वार्थ दान के भाव बा, जे बिना कवनो आस के फूल-फल दे ला। इ पंक्ति जिनिगी में उदारता के प्रेरणा देतिया। ‘जवने हाथे देबऽ पंचे ओही हाथ पइबऽ, जवने जीनिस बोइबऽ तू ओही के ओसइब’ में कर्मफल के सिद्धांत साफ दिखऽता। जइसन बोअबऽ, ओइसन कटबऽ। एहिजा ‘देबऽ’ यानी देना आ ‘पइबऽ’ यानी पाना, एगो सरल, सोझ बाकिर गहिर अर्थ के दर्शन करावऽता। ‘दुनिया खातिर त्यागी भइल—जोगी रूप बनवलें, आपन सम्पति दूनू हाथे सबके लुटवलें’ में त्याग आ सेवा के भाव बा, जे महुआ जइसन सबके काम आवे के प्रेरणा देता। इ मय लाइन जिनिगी के चक्र, कर्म आ नैतिकता पऽ रोशनी डालतिया, जवन एह गीत के महज कवनो आम रचना से कहीं बेसी बनावऽतिया।
असल में इ गीत मनई आ प्रकृति के गहिर अंतरसंबंध आ रिश्ता के भी उजागर करऽता। महुआ के पेड़ एहिजा एगो संसाधन भर नइखे, बलुक भावनात्मक आ आध्यात्मिक सहारा भी बा। इ मनई के ओकरे परिवेश से जोड़ऽता। साथे-साथ, इ भोजपुरी समाज के सामूहिक चेतना आ सांस्कृतिक पहचान के भी देखावऽत भा बतावऽता। ‘महुआ टप-टप फूल चुवावें, लड़के सेल्हा ले ले धावें’ में लइकन के फूल खातिर दउरत चित्र आ ‘सैंया खातिर बारी धनियां महुअरि पकावेली’ में पति आ परिवार खातिर खयका बनावे के झलकी, असल में सामाजिक जिनिगी के चित्रण ही हऽ। साँच कहीं तऽ इ गीत गाँव के आर्थिक आ सामाजिक ताना-बाना के भी देखावऽता, जहवाँ महुआ के बड़हन भूमिका बा।
बाकिर हमरा जाने से एह गीत के भाषाई समृद्धि एकर बड़वर खासियत बा। एह में कइगो अइसन शब्द बा, जवन अब आम बोल-चाल से गायब हो गइल बा। मसलन ‘कोंचवाँ’, ‘पुलुई’, ‘कुरुई’, ‘डाढ़ी-डाढ़ी’, ‘लोढ़े’, ‘सेल्हा’, ‘लपसी’, ‘सरावल’, ‘धनियां’, ‘बनिहारे’, ‘मूड़ी’, आ ‘कुरुवानी’। इ मय शब्द भोजपुरी के मौलिक आ आपन शब्द हऽ। एह शब्दन में रउआ सभे के भोजपुरी के शाब्दिक ताकत आ विविधता के झलकी मिली। बाकिर एहिजा इ मय शब्द, ‘महुआबारी’ में खाँटी स्वाद भरत बाड़ेसन। एकर इस्तेमाल सांस्कृतिक जड़ से जोड़े आ भाषाई संरक्षण के महत्व के बतावऽता।
‘महुआ बारी’ के लोकप्रियता आ सांस्कृतिक महत्व, एह गीत के भोजपुरी साहित्य में अनूठा स्थान के देवे के माँग करऽता। आचार्य मुकेश से लेके अशोक द्विवेदी जइसन साहित्यकार एकर तारीफ कइले बाटे सभे। इ मोती जी के एगो दोसर गीत (‘सेमर के फूल’) जइसन लोकप्रिय गीतन के साथे, जनमानस में रचल-बसल बा। असल में इ बस एगो गीत भर नइखे। जिनिगी के मोसलसल दर्शन बा। एहिजा महुआ के बहाने गँवई जिनिगी, मेहनत आ आनंद के सोझा आवऽता। मोती जी, एकरा के अतना प्रभावी ढंग से रचले बानी कि इ हर सुनइया के मन पऽ आपन छाप छोड़ जाला। छू लेला। आजो जब इ गीत कहीं गवाला, तऽ गँवई माटी के सोंधी खुशबू आ महुआ के मादकता जीवंत हो उठेला। मन सीधे कवनो महुआबारी में चली जाला। मोती जी के इ ‘महुआ बारी’, भोजपुरी भाषा आ संस्कृति के अइसन खजाना बा, जे अगिला पीढ़ियन खातिर प्रेरणा आ गर्व के स्रोत बनी।
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साँच आ साफ बात कही तऽ ‘महुआ बारी’ एगो अइसन रचना बा, जे गँवई सुगंध, सांस्कृतिक धरोहर, आनंद आ दुख के संतुलन, लोकगीत के सहजता, काव्य के कुशलता, प्रकृति के जीवंतता, गाँव के बिम्ब, गहिराह जीवन दर्शन आ मनई-समाज के रिश्ता के समेटले बा। ई गीत ख़ाली सुनले खातिर नइखे। तनिका डूब के महसूस करे आ जिये खातिर भी बा।
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