लखनऊ (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किसानों की आय दोगुना करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति को बताने व नवाचार के लिए अब बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) भी आगे आ गया है। वह लखनऊ, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के गावों में किसानों और समाज के स्थायी कृषि और समग्र विकास के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार हब विकसित करेगा।
इसके लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग-इक्विटी, एम्पावरमेंट एंड डेवलपमेंट विभाग (डीएसटी-एसईईडी), नई दिल्ली ने “उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश) में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (एसटीआई) हब” नामक एक बड़ी परियोजना को मंजूरी दी है। प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू, केंद्रीय विश्वविद्यालय), लखनऊ को कानपुर देहात क्षेत्र, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के 6-6 गांव में मिट्टी के सुधार और अन्य कृषि आधारित मौलिक समस्याओं के समाधान के लिए यह मंजूरी मिली है।
तीन स्वयं सेवी संस्थाएं भी इस परियाेजना में होंगी साझेदारबीबीएयू, लखनऊ में प्रो. अरोड़ा की टीम के अलावा, संबंधित राज्यों के तीन एनजीओ भी इस परियोजना में क्षेत्रीय साझेदार के रूप में काम करेंगें। प्रो. अरोड़ा इस परियोजना के प्रधान अन्वेषक (पीआई) है और परियोजना के सुचारू संचालन के लिए और गांवों में उचित पैदावार के लिए अन्य तीन क्षेत्रीय साझेदारों का नेतृत्व करेंगें। प्रो. अरोड़ा की टीम के पास लाभदायक और महत्वपूर्ण जीवाणु उपभेद है, जो जैविक भागीदारी के माध्यम से मिट्टी को क्षारीय से उपजाऊ बनाने में सक्षम हैं।
प्रो. अरोड़ा को क्षारिय मिट्टी को उपजाऊ बनाने में महारतप्रो. अरोड़ा ने पहले से ही विकसित जैव उर्वरक के उपयोग के माध्यम से क्षारीय मिट्टी को उपजाऊ बनाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। वर्ष 2014 से अब तक, वह और उनकी टीम क्षारीय मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए कुछ गांवों में अपने द्वारा विकसित जैव उर्वरक को लागू कर रहे हैं और इसके परिणाम बहुत सराहनीय रहे हैं। जैविक संसाधनो के माध्यम से भूमि का सफलतापूर्वक सुधार किया गया था और अब किसान वहां संवेदनशील फसलों की खेती भी कर रहे हैं।
हर सर्वोत्तम तरीके से मदद करना है परियाेजना का उद्देश्यइस बार इस परियोजना के माध्यम से, प्रो. अरोड़ा का उद्देश्य इस तकनीक को व्यापक पैमाने पर विस्तारित करना और किसानों को हर सर्वोत्तम संभव तरीके से मदद करना हैं। यह परियोजना किसानों की आय में वृद्धि करने में भी मदद करेगी। परियोजना का मुख्य उद्देश्य जैविक तरीकों का विकास करना है और विशेष रूप से तीन राज्यों के चयनित क्षेत्रों में नियमित रूप से जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के किसानों को इसके लाभ प्रदान करना है।
मिट्टी व पानी के नमूनों का मूल्यांकन कर स्थानीय लोगों को जागरूक करेगी टीमपरियोजना के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य, चयनित क्षेत्रों में मिट्टी और पानी के नमूनो की जांच एवं मूल्यांकन, मिट्टी और जल संरक्षण के लिए स्थानीय अबादी को समस्याओं के बारे में जागरूकता और समाधान प्रदान करना शामिल है। आज तक, जैव-प्रौद्योगिकी आधारित खेती की इन क्षेत्रों में कमी है और केवल रासायनिक विधियों द्वारा पुनर्ग्रहण की कोशिश की गई है, जो कृषि-प्रणालियों के लिए गैर-टिकाऊ और हानिकारक है।
सामान्य सुविधा केन्द्र भी होगा स्थापितइस परियोजना का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक उद्देश्य बीबीएयू में एक सामान्य सुविधा क्रेंद्र (सीएफसी) विकसित करना भी है। सीएफसी एक बेहतर गुणवत्ता और प्रमाणित बीज प्रदान करने, स्वदेशी किस्मों के संरक्षण पर प्रशिक्षण, जैव उर्वरक का निर्माण, फसल कटाई के बाद के नुकसान की रोकथाम के लिए प्रौद्योगिकी, संसाधन प्रबंधन, जल और कृषि अपशिष्ट प्रबंधन, खाद्य प्रसंस्करण और उत्पाद विकास, जैविक कृषि के लाभों के साथ-साथ आधुनिक कृषि उपकरणों के प्रभावी उपयोग के बारे में किसानों और समुदाय में जागरूकता प्रदान कराने के लिए उपयोगी होगा।
बाजार व किसानों के बीच मजबूत संबंध बनाने पर भी होगा जोरयह परियोजना किसानों के कृषि उत्पादों की मार्केटिंग को सुविधाजनक बनाने के लिए, बाजार और किसानों के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करेगी। चयनित गावों में बागवानी फसलों को भी बेहतर बनाया जायेगा। सीएफसी के अन्तगर्त, एक किसान उत्पादन संगठन (एफपीओ) भी बनाया जायेगा जो उत्पादों को ( बागवानी और जैविक उत्पाद) बनाने के लिए कृषि उपज के उपयोग में मदद करेगा। क्रेंद्र का लक्ष्य इन ही गांवों से उद्यमियों को विकसित करना और प्रत्येक तीन राज्यों में स्टार्ट-अप शुरू करना भी होगा।
