जानकी शरण द्विवेदी
गोंडा। मिशन शक्ति के तृतीय चरण में अनवरत चलाए जा रहे कार्यक्रम के अंतर्गत ’1857 के विद्रोह में वीरांगनाओं की भूमिका’ विषय पर श्री लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज के ललिता सभागार में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए एलबीएस कॉलेज की पूर्व प्राचार्य एवं इतिहास विभाग की अध्यक्ष डॉ. वंदना सारस्वत ने कहा कि 1857 का संग्राम ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ी और अहम घटना थी। इस क्रांति की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई, जो धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गई। क्रांति की शुरुआत तो एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदलकर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक जन व्यापी विद्रोह के रूप में हो गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहां गया। अपने वक्तव्य में डॉक्टर वंदना जी ने आजादी की पहली लड़ाई के इस वर्षगांठ के अवसर पर इसके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और तत्कालीन कारणों की विस्तृत जानकारी दी। साथ ही साथ अपने वक्तव्य में 1857 की क्रांति में वीरांगनाओं की क्या भूमिका रही। इस पर एक सार्थक जानकारी छात्राओं को दी।
उन्होंने अपने वक्तव्य में रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, किंतुर रानी चेन्नम्मा, बेगम हजरत महल, एनी बेसेंट, भीकाजी कामा, सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, कमला नेहरू, डॉ लक्ष्मी सहगल, दुर्गाबाई देशमुख आदि वीरांगनाओं की 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में क्या भूमिका रही, इसकी विस्तृत जानकारी छात्राओं को दी। उन्होंने बताया कि प्रत्येक नारी शक्ति का रूप है और शिक्षा, महिला सशक्तिकरण की प्रथम और मूलभूत आवश्यकता है। शिक्षित नारी को अपनी क्षमता और सामर्थ्य का बेहतर प्रदर्शन करने का मौका मिल जाता है इसलिए महिलाओं को यदि उनकी शक्ति का है एहसास कराना है तो बस उन्हें शिक्षित अवश्य किया जाए। आपने अपने वक्तव्य में कहा कि महिलाओं को समाज में, परिवार में, और संस्था में उनकी राय को भी महत्व दिया। उन्होंने कहा कि हमारी महिलाएं हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए ैयार रहती हैं और आज हर क्षेत्र में जमीन से लेकर आसमान तक वह अपना योगदान दे रही हैं। लेकिन आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है जिसके लिए कहीं ना कहीं वह स्वयं भी जिम्मेदार है ।इसलिए महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उन्हें आगे आना होगा, अपनी शक्ति को पहचानना होगा ,अपनी जगह स्वयं बनानी होगी। हालांकि पहले से आज महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी हो गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है ,कि वह पुरुषों के समान आ गई है अभी यह लड़ाई बहुत लंबी लड़नी है। इतिहास विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमन चंद्रा जी ने परामर्श सत्र में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। डॉ. अमन चंद्रा जी ने परामर्श सत्र में छात्र-छात्राओं की जिज्ञासाओं का शमन करते हुए 1857 की क्रांति से जुड़ी जो भी जिज्ञासाएं छात्र छात्राओं की थी, उनकी विस्तृत जानकारी दी। आज के कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर चमन कौर ने किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य प्रोफेसर रवीन्द्र कुमार पांडेय ने धन्यवाद ज्ञापन में कार्यक्रम में आए मुख्य अतिथि एवं सभी अग्रज, अनुज प्राध्यापक गण, प्राध्यापिकाओं, छात्र-छात्राओं, मीडिया बंधु सभी का धन्यवाद दिया। प्राचार्य ने झांसी की रानी के बारे में कहा, ‘पीठ पर वंश लिए, हाथों में विध्वंस लिए, वह तलवारों से क्रांति की कहानी लिख गई। हो रहा था फैसला जब भारत के भाग्य का, तब लहू से स्वराज, झांसी की रानी लिख गई।’ प्राचार्य ने कार्यक्रम की नोडल अधिकारी एवं संचालक डॉ. चमन कौर बीएड विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री को सफल संचालन एवं पोस्टर का सही उपयोग करने के लिए प्रशंसा की। आज के कार्यक्रम में शिक्षक संघ अध्यक्ष डॉ शैलेंद्र कुमार मिश्र, महामंत्री डॉ. मंशाराम वर्मा, डॉ. जयशंकर तिवारी, डॉ. अभय श्रीवास्तव, डॉ. शरद चंद्र मिश्र, डॉ आरबी सिंह बघेल, डॉ. स्मृति, डॉ. संध्या सिंह, सरोजिनी, साध्वी, डॉ. नीतू सक्सेना, डॉ. दीप्ति, डॉ. खुशबू, डॉ स्मिता, हनुमान प्रसाद, रेखा, रीता एवं छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
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जानकी शरण द्विवेदी
सम्पादक
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