श्री राम जानकी धर्मशाला में जुगल किशोर अग्रवाल की स्मृति में आयोजित कथा का चौथा दिन
जानकी शरण द्विवेदी
गोण्डा। अपने पति में बांके बिहारी का दर्शन करना तथा पराए पुरुष के बारे में स्वप्न में भी विचार न करना नारी का सर्वोच्च धर्म है। इसी प्रकार अपनी पत्नी के अलावा विश्व की समस्त स्त्रियों को माता, बहन मानकर उनका सम्मान करना चाहिए। जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है। यह बात वृन्दावन धाम के ख्यातिलब्ध कथाकार पंडित राधेश्याम शास्त्री ने स्व. जुगल किशोर अग्रवाल की पावन स्मृति में रानी बाजार स्थित श्रीराम जानकी मंदिर में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के चौथे दिन श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए कही।
व्यास पीठ ने कहा कि धर्म ग्रन्थों में सत्य बोलना, किसी का बुरा न सोंचना, धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय, अन्न दान व ईश स्तुति आदि धर्म के 30 लक्षण बताए गए हैं। व्यक्ति इनका पालन करके गृहस्थ जीवन में भी धर्मोचित कार्य कर सकता है। उन्होंने कहा कि नारी को स्वप्न में भी पराए पुरुष के बारे में नहीं सोचना चाहिए। पति ही उसका गुरु है। इसलिए महिलाओं को ज्यादा गुरुओं के चक्कर में भी नहीं पड़ना चाहिए। हालांकि अधिकांश महिलाओं का स्वभाव इसके विपरीत होता है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार पुरुषों को भी एक नारी ब्रत धारण करते हुए सभी महिलाओं का यथोचित सम्मान करना चाहिए। जिस घर में नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए हैं। इनमें बेहतर समन्वय से परिवार में सुख-शांति एवं लक्ष्मी की वृद्धि होती है।

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व्यास पीठ ने कहा कि भारत की संस्कृति के समान विश्व के किसी भी देश की संस्कृति नहीं है। यहां जीते जी माता-पिता को भगवान मानते हैं और उनके न रहने पर भी चित्र लगाकर उनकी पूजा करते हैं। वर्ष में एक बार पितृ पक्ष में उनके पुण्य तिथि पर ब्राम्हण खिलाकर श्राद्ध करते हैं। शास्त्रों की ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध के वक्त हमारे पूर्वज स्वयं अवतरित होकर अपना ग्रास ग्रहण करते हैं और संतानों को आशीर्वाद देते हैं। श्रीराम चरित मानस से एक प्रसंग को उद्यृत करते हुए शास्त्री जी ने कहा कि वनवास के समय जब भगवान राम ने राजा दशरथ का श्राद्ध करने के लिए गुरु वशिष्ठ को आमंत्रित करके भोजन कराया और विदाई के समय उन्हें प्रणाम करने के लिए सीता जी भी आईं तो उन्होंने अपना चेहरा ढ़क लिया। भगवान राम ने उनसे पूछा कि गुरु जी से कैसा पर्दा? इस पर सीता ने जवाब दिया कि गुरु जी के चेहरे में आज मेरे ससुर जी दिखाई पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने पितरों का श्राद्ध यथा शक्ति अवश्य करना चाहिए। यदि कुछ न मिले तो घास छीलकर गाय को खिला देने मात्र से हमें पुण्य मिलता है।

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मानव जीवन की चार अवस्थाओं ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं सन्यास की चर्चा करते हुए व्यास पीठ ने कहा कि ब्रम्हचारी को नारी से सदैव दूरी बनाकर रखनी चाहिए, चाहे वह गुरु की पत्नी अथवा कन्या ही क्यों न हो। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए जो भी कर्म करें, उसे भगवान को अर्पित कर देना चाहिए। पितरों की पुण्य तिथियों में दान करना चाहिए। समय-समय पर तीर्थ यात्रा भी अवश्य करें। भगवान के उत्सव में जरूर जाएं। पिता जी का श्राद्ध जरूर करें। श्रेष्ठ ब्राम्हण को भोजन कराएं। जो व्यक्ति अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धा से करता है, उसकी वंश वृद्धि होती है। घर में रहते हुए भी गोविन्द का भजन करते हुए सबसे बड़ा गृहस्थ धर्म है। इसके अलावा गुरुवार को भक्त प्रहलाद, नरसिंह चरित्र, गजेन्द्र मोक्ष, कच्छप अवतार, समुद्र मंथन आदि की कथा भी सुनाई गई। इससे पूर्व पंडित गोपाल कृष्ण शास्त्री ने पूजन अर्चन के साथ कथा का शुभारम्भ किया।

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कथा के आयोजक अनुपम अग्रवाल ने बताया कि रोजाना तीन बजे से इस कथा का दिशा टीवी, यू-ट्यूब, फेसबुक पेज पर भी सीधे प्रसारण भी होता है। इस मौके पर स्व. अग्रवाल की धर्मपत्नी श्रीमती सरोज अग्रवाल, उनकी पुत्रबधू रश्मि अग्रवाल, अनिल मित्तल, राजेन्द्र प्रसाद गाडिया, पूर्व विधायक तुलसीदास राय चंदानी, पूर्व चेयरमैन राजीव रस्तोगी, केके श्रीवास्तव एडवोकेट, राजा बाबू गुप्ता, डा. एचडी अग्रवाल, मुकेश अग्रवाल पिण्टू, संजय अग्रवाल, विक्रम जी, कृष्णा गोयल, अतुल अग्रवाल, संदीप अग्रवाल, रेनू अग्रवाल, अंशू अग्रवाल, अर्पिता अग्रवाल समेत सैकड़ो श्रद्धालु मौजूद रहे।

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