जानकी शरण द्विवेदी
गोण्डा। पढ़ी लिखी होते हुए भी समाज की कुछ कुरीतियों और परंपरागत सोंच के कारण संगीता अपने बच्चों व परिवार के लिए कुछ कर नहीं पा रही थी। बावजूद इसके कि संगीता में अपने परिवार और समाज का जीवन स्तर बेहतर बनाने की प्रबल इच्छा थी। वह बहुत कुछ करना चाहती, पर सुसराल से कोई बढ़ावा नहीं मिलता। यह आप बीती है शहर मुख्यालय से सटे हुए झंझंरी ब्लॉक के खैरा बगिया गाँव में रहने वाली संगीता मिश्रा का, जो एक मध्यम वर्गीय परिवार से हैं। संगीता बताती हैं कि वर्ष 2006 में उन्हें आशाओं के चयन की जानकारी हुयी। घर वालों से जब इसके लिए बात किया, तो उन्होंने समाज और लोग क्या कहेंगे कहकर मना कर दिया, लेकिन पति, जो पेशे से वकील हैं को काफी समझाने और कई कामकाजी महिलाओं का उदाहरण देने के बाद पति के साथ घर के अन्य लोग भी तैयार हो गए। मेरा चयन आशा कार्यकर्ता के रूप में हो गया। ऐसे में जब आगे बढ़कर कुछ करने का मौका मिला, तो दृढ़ निश्चय किया कि घर-परिवार और गाँव की हालत बदल कर रहूंगी। मैंने काम शुरु किया, तो सामने समाज की अशिक्षा, गरीबी, भेदभाव, लोगों में जागरुकता की कमी, महिलाओं की स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता, अंधविश्वास, टीकाकरण न कराना, घर पर प्रसव को पसंद करने जैसी बड़ी चुनौतियाँ थीं। सबसे पहले साफ़-सफाई के बारे में गाँव वालों को जागरुक किया। जब थोड़ा बदलाव आया, तो मेहनत सफल होती दिखी। अगले कदम के रूप में मैंने अपने कार्यक्षेत्र जानकी नगर, इमलिया गुरुदयाल और बड़गाँव में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन कर लोगों को टीकाकरण का महत्व समझाया। पहली बार शिविर के लिए मैंने घर-घर जाकर लोगों को इकठ्ठा किया। निरंतर प्रयास करते रहने से अब प्रत्येक बुधवार और शनिवार को आयोजित होने वाले वीएचएसएनडी व अन्य शिविरों में लोग खुद भी पहुँचने लगे हैं। जहाँ से सभी के स्वास्थ्य की जाँच, बच्चों को टीके, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को सेहत की बाते बताने में आसानी हुयी है।
सूझबूझ से बचाई माँ-बच्चे की जान :
संगीता बताती हैं कि पिछले वर्ष उनके कार्यक्षेत्र में महिला गर्भवती हुयी, जो मंदबुद्धि थी। न तो उसे और न ही घर वालों को उसके गर्भवती होने की जानकारी हुयी। गर्भावस्था के पहले-दूसरे महीने में वह महिला अपने मायके चली गयी, जिस वजह से उसकी जरूरी जांचें नहीं हो पायीं और बच्चा ख़राब हो गया। इसकी जानकारी जब मुझे मिली, तो बहुत दुःख हुआ। जब वह महिला दोबारा गर्भवती हुयी, तो उसके पति और जेठानी को बार-बार प्रेरित कर उसकी प्रसव पूर्व की चार जांचें करवाई, हीमोग्लोबिन कम होने पर आयरन-सुक्रोज चढ़वाया और आयरन-फोलिक एसिड गोली का सेवन कराने हेतु उसका नियमित फॉलोअप किया। उस महिला का प्रसव पिछले माह फ़रवरी में महिला अस्पताल में हुआ। जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। वह बताती हैं कि मेरे कार्यक्षेत्र तोपखाना मोहल्ले में कुछ परिवार ऐसे थे, जो अपने बच्चों को टीका लगवाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं होते थे। उनका कहना था कि हमारे घर-परिवार में अभी तक किसी को टीका नहीं लगा है और सभी लोग ठीक हैं। हम अपने बच्चों को टीका नहीं लगवायेंगे। ऐसे में मैंने उन परिवारों का लगभग दो सालों तक नियमित फॉलोअप किया, उन्हें टीकाकरण कराने से होने वाले फायदों और न कराने से होने वाली जानलेवा बीमारियों के बारे में बताया। उनके सामने आसपास के दूसरे बच्चों की मिशाल रखी, जिन्हें टीका लगा और वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। आज नतीजा यह है कि लगभग सभी परिवार अपने बच्चों को टीका लगवाने हेतु सत्र स्थल पर खुद पहुँचते हैं।
स्वास्थ्य आंकड़ों में आई सुधार :
बीसीपीएम संतोष कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि संगीता के प्रयास और सहयोगात्मक पर्यवेक्षण से उनके कार्यक्षेत्र के स्वास्थ्य आंकड़ों में बेहद सुधार आई है द्य पहले जहाँ 41 फ़ीसदी गर्भवती महिलाओं का ही चिन्हांकन हो पता था, वह अब बढ़कर 65 फ़ीसदी तक पहुँच गया है। शून्य से 2 वर्ष तक के बच्चों का टीकाकरण की दर 36 से बढ़कर 59 फ़ीसदी, संस्थागत प्रसव 25 से बढ़कर 37, पूर्ण प्रतिरक्षण 35 से बढ़कर 50 हुआ है। इसके अलावा पहले जहाँ 15 प्रतिरोधी परिवार (ग्त्) टीकाकरण नहीं करवाते थे, वहीं अब 13 प्रतिरोधी परिवार टीकाकरण कराने लगे हैं। मिश्रौलिया व पंतनगर उपकेन्द्र की 22 आशा कार्यकर्ताओं की सहयोगी पर्यवेक्षक बनाते हुए विभाग द्वारा वर्ष 2016 में मुझे आशा संगिनी पद की जिम्मेदारी सौंपी गयी। काम के प्रति लग्न और मेहनत देखकर हर साल आयोजित होने वाले आशा सम्मलेन में संगीता को तीन बार प्रथम व एक बार द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कोरोना काल में बेहतर प्रदर्शन के लिए भी उन्हें झंझरी ब्लॉक की में प्रथम स्थान के पुरस्कार से सम्मनित किया गया।
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जानकी शरण द्विवेदी
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