Wednesday, February 11, 2026
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Gonda News:पिता के प्यार व सही उपचार से टीबी गयी हार

12 साल की उम्र में टीबी से ग्रसित बच्ची ने दी टीबी को मात

जानकी शरण द्विवेदी

गोण्डा। मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए, यह साबित कर दिखाया है जिला मुख्यालय से 27 किमी. दूर ग्राम व ब्लॉक मुजेहना की 14 वर्षीया ज्योति (बदला हुआ नाम) ने, जो महज 12 साल की उम्र में ही टीबी (क्षय रोग) की बीमारी की चपेट में आ गयी थी। यही नहीं, समय पर बीमारी का पता न चल पाने के कारण टीबी बिगड़ चुकी थी। टीबी का जब पता चला तो भले ही देर हो चुकी थी, लेकिन ज्योति के साथ उसके घर वालों ने भी ठान लिया कि बीमारी को मात देने के लिए वह हर जरूरी हिदायत बरतेंगे और पूरा उपचार करेंगे। नतीजा रहा कि पिता का प्यार, टीबी अस्पताल में जांच और नोडल डीआर टीबी सेंटर बस्ती में कन्वेंसनल ट्रीटमेंट का मिला संग तो ज्योति ने जीत लिया टीबी से जंग।
ज्योति के पिता का कहना है कि लगभग तीन साल पहले वर्ष 2018 में जब ज्योति गांव के ही जूनियर हाईस्कूल में 7वीं कक्षा में पढ़ती थी। उस दौरान उसे बार-बार बुखार आना, बुखार से चेहरा बिल्कुल लाल हो जाना और सांस फूलने की समस्या होनी शुरू हुई थी। निजी चिकित्सकों और मेडिकल स्टोर की दवा से कोई फायदा नहीं हो रहा था। कभी-कभी स्कूल समय में भी उसकी तबियत ज्यादा बिगड़ जाती थी। एक दिन उसके अध्यापक ने विद्यालय बुलाया और किसी बड़े चिकित्सक को ज्योति को दिखाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि लापरवाही बच्ची की जान पर भारी पड़ सकती है। उसके बाद मई 2019 में जब ज्योति को जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ समीर गुप्ता को दिखाया, तो उन्होंने लक्षण के आधार पर टीबी की आशंका जताई और जांच के लिए कहा। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इस उम्र भी टीबी हो सकती है, लेकिन जब मेडिकल जांच कराई गई, तो रिपोर्ट में टीबी की पुष्टि हुई। वह भी विकराल रूप वाली टीबी यानी एक्स्टेंसिवली ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एक्सडीआर टीबी), जिसका इलाज नोडल डीआर टीबी सेंटर बस्ती में 24 से 27 महीने तक चलने वाला कन्वेंसनल ट्रीटमेंट था। इसमें अस्पताल के डिस्ट्रिक्ट पीएमडीटी ऐंड टीबी-एचआईवी कोआर्डिनेटर अरविन्द कुमार मिश्र व आरएनटीईपी के जिला समन्वयक विवेक सरन ने न केवल बार-बार प्रोत्साहित किया, बल्कि हर स्तर पर मदद की। लगभग दो साल के इलाज और घर-परिवार के प्यार व दुलार से ज्योति अब पूरी तरह स्वस्थ है। चिकित्सकों का कहना है कि अब उससे घर के अन्य सदस्यों को टीबी होने का कोई खतरा नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि दो सप्ताह तक लगातार खांसी, कभी-कभी खांसी और बलगम के साथ खून आना, भूख कम लगना, शाम के वक्त बुखार आना, सीने में दर्द होना अथवा वजन घटना टीबी के लक्षण हो सकते हैं।
क्षय रोग अधिकारी डॉ मलिक आलमगीर का कहना है कि राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत जिले में टीबी की सभी प्रकार जांच व उपचार पूरी तरह निःशुल्क है। मरीजों के सभी आंकड़े गोपनीय रखे जाते हैं द्य लोग बीमारी को छिपायें नहीं बल्कि जाँच व इलाज करायें। निःक्षय पोषण योजना के तहत टीबी मरीजों को इलाज के दौरान खानपान के लिए पांच सौ रुपये प्रतिमाह उनके बैंक खाते में दिए जाते हैं। डॉ. मलिक का कहना है कि पिछले वित्तीय वर्ष में जनपद में 76 बच्चों को टीबी से मुक्ति दिलाकर स्वस्थ बनाया गया है।

कलमकारों से ..

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