दहेज हत्या के आरोपी पति, सास-ससुर को किया दोषमुक्त
न्यायाधीश ने कहा-डीएम और एमसीआई को भेजी जाए निर्णय की प्रति
जानकी शरण द्विवेदी
गोंडा। जिले की एक अदालत ने करीब छह वर्ष पूर्व दर्ज कराए गए दहेज हत्या के एक मामले में शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए न केवल आरोपी पति व सास-ससुर को दोष मुक्त करार दिया, बल्कि मुकदमे के विवेचक व पीड़ित महिला का प्रथम उपचार करने वाले चिकित्सक के विरुद्ध गंभीर टिप्पणी करते हुए निर्णय की प्रति जिलाधिकारी व भारतीय चिकित्सा परिषद को भी भेजे जाने का निर्देश दिया है।
विवरण के अनुसार, वजीरगंज थाना क्षेत्र की निवासी गुड़िया (21) पत्नी श्याम बाबू पुत्री दीना नाथ तीन मार्च 2016 को अपनी ससुराल में गंभीर रूप से जल गई थी। उसकी शादी घटना से करीब तीन वर्ष पूर्व अप्रैल 2013 में हुई थी। ससुराली जन उसे उपचार के लिए जिला मुख्यालय लेकर आए और आरएन पाण्डेय नर्सिंग होम में भर्ती कराया। कुछ समय तक उपचार के बाद स्थिति गंभीर होने के कारण चिकित्सक ने उसे हायर सेंटर के लिए रेफर कर दिया। घटना के तीसरे दिन रास्ते में उसकी मौत हो गई। मृतका के पिता दीनानाथ की तरफ से वजीरगंज थाने में अभियुक्त गण श्याम बाबू (पति), विशुन दयाल (ससुर) व विमला देवी (सास) के विरुद्ध भादवि की धारा 498ए, 304बी व धारा 3/4 दहेज प्रतिषेध अधिनियम के अन्तर्गत दर्ज कराया गया। प्रकरण दहेज हत्या से जुड़ा होने के कारण पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी सीओ तरबगंज विजय आनंद तथा अमित किशोर श्रीवास्तव ने विवेचना की। अंतिम विवेचक अमित किशोर ने तीनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय प्रेषित किया। सत्र परीक्षण के दौरान अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (ईसी एक्ट) डा. पल्लवी अग्रवाल ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों, अभियोजन व बचाव पक्ष के गवाहों तथा उभय पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं को तर्कों को सुनने के उपरान्त कहा कि अभियोजन न तो पीड़िता के साथ दहेज की मांग या अक्रूरता को सिद्ध कर पाया है और न ही हत्या साबित है। अतः अभियुक्त गणों के विरुद्ध आरोपित अपराध को संदेह से परे साबित नहीं कर सका है। परिणाम स्वरूप सभी अभियुक्तों को दोषमुक्त किया जाता है। किन्तु इसके साथ ही अपने निर्णय में न्यायाधीश ने मुकदमे के विवेचक और प्रथम उपचार करने वाले चिकित्सक के विरुद्ध गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि पीड़िता गुड़िया 03 मार्च 2016 को आरएन पाण्डेय हॉस्पिटल में भर्ती हुई, जहां पर उसकी स्थिति के सम्बन्ध में खराब अंकन किया गया है। भर्ती प्रपत्र पर प्राथमिक उपचार के तौर पर उसे छः दवाएं दिया जाना अंकित है। तत्पश्चात उसी प्रपत्र के ऊपरी भाग पर हायर सेण्टर केजीएमयू लखनऊ रेफर किया जाना भी दर्शित है। न्यायाधीश ने कहा, ‘न्यायिक दृष्टांत परमानंद कटारा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से दिशा निर्देश जारी किये गये हैं कि आवश्यक परिस्थितियों में चिकित्सकीय कार्य से जुड़े व्यक्ति आवश्यक चिकित्सा उपलब्ध कराएंगे तथा जान बचाने का पूर्ण प्रयत्न करेंगे। किन्तु इस घटनाक्रम में कोई जानकारी पीड़िता को बचाने की या उसके इलाज की नहीं दी गयी है। यहां तक की जलने का प्रतिशत अंकित न होने से यह भी ज्ञात नहीं होता है कि पीड़िता कितनी बुरी स्थिति में रही। साथ ही कितने घण्टों या दिनों तक पैसों के कारण इलाज नहीं किया गया। यह अत्यधिक पीड़ादायक है कि गंभीर रूप से जली हुई एक स्त्री इलाज के अभाव में अकारण ही दो दिन तक तड़पती रही और अस्पताल में होते हुये चिकित्सकों को उसकी स्थिति के बारे में काई जानकारी नहीं है। यह निश्चित रूप से असंवेदनशीलता की परकाष्ठा है। ऐसे संगीन प्रकरण में चिकित्सकों को अति विशिष्ट सावधानी का परिचय देते हुये अपने प्राथमिक दायित्वों को पूर्ण निर्वहन करना चाहिए, जो कि इस प्रकरण में नहीं किया गया है। इसके साथ ही मेडिकल कॉन्सिल ऑफ इण्डिया के दिशा-निदेशों का भी उल्लंघन किया गया है। इस प्रकार प्रथम चिकित्सा सेण्टर का कार्य निश्चित रूप से संदिग्ध व चिकित्सकीय मानकों के विरुद्ध है।’ बता दें कि बचाव पक्ष की तरफ से पेश गवाह डा. राजेश पाण्डेय ने कहा था कि उन्होंने पीड़िता को उसी दिन हायर सेंटर के लिए रेफर कर दिया था किन्तु परिजन पैसे का प्रबंध करके उसे बाद में लखनऊ लेकर गए।
न्यायाधीश ने निर्णय में लिखा है, ‘डॉ. राजेश कुमार पाण्डेय के अस्पताल द्वारा पुलिस को सूचना कब दी गई, इसका भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है। चिकित्सक ने अपने बयान में भी यह नहीं बताया है कि मृतका को डिस्चार्ज कब किया गया और डिस्चार्ज के समय उसकी क्या स्थिति थी? पीड़िता होश में थी या बेहोश थी। कोई डिस्चार्ज समरी नहीं बनायी गयी। जैसा कि अपने अस्पताल में बीस घण्टे का इलाज होने की बात चिकित्सक ने स्वीकार की है, तो तीन मार्च 2016 को समय 04ः20 बजे (जो कि रसीद पर अंकित है) से बीस घण्टे 04 मार्च 2016 को होते हैं। इस मुताबिक डिस्चार्ज 04 मार्च 2016 का होना चाहिए, जबकि पीड़िता की मृत्यु 05 मार्च 2016 को लखनऊ ले जाते समय हुई थी। पीड़िता 03.03.2016 से 05.03.2016 तक किस हालत में व कहां रही है, इस तथ्य को चिकित्सक ने नहीं बताया है।’ अदालत ने कहा, ‘इतने गम्भीर प्रकरण में चिकित्सक ने कहा कि मरीज कितने बजे उनके अस्पताल से गया, उन्हें नहीं पता। हमने फौरन रेफर कर दिया था, परन्तु उसके घर वाले पैसों का इन्तजाम करने के बाद मरीज को लेकर गये। यदि मृतका के घर वाले कुछ समय के पश्चात मृतका को जीवित अवस्था में लेकर गये, तो इतने समय पीड़ता को बिना इलाज के अस्पताल में रखना अत्यधिक आपत्ति जनक है तथा पुलिस को भी कोई सूचना प्रदान न करना अपस्ताल के कार्य को संदिग्ध बनाता है।’
अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि मृतका को आग लगने के पश्चात उसके सास व ससुर अस्पताल लेकर गये। 03 मार्च से 05 मार्च 2016 तक वह जिन्दा थी। घटना के अगले ही दिन पीड़िता के माता पिता मय रिश्तेदार अस्पताल पहुंचे किन्तु न तो उन्होंने कोई सूचना थाने पर दी और न ही चिकित्सक ने पुलिस को सूचित दिया, जो कि विधितः चिकित्सक पर आरोपित दायित्व भी था। परिणाम स्वरूप पीड़िता का कोई मृत्यु कालिक कथन भी अंकित नहीं कराया जा सका, जो कि इस वाद में सारवान साक्ष्य हो सकता था। इतने गम्भीर घटनाक्रम में प्रथम चिकित्सक डॉ. राजेश कुमार पाण्डेय का कृत्य अत्यधिक गैर जिम्मेदाराना व विधि विरुद्ध है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि पीड़िता का पति श्यामबाबू पूरे घटनाक्रम में मौजूद नहीं था। अभियोजन साक्षी गणों ने भी यही बयान किया है कि श्याम बाबू मौके पर मौजूद नहीं मिला था। पीड़िता की माता ने यह भी कहा है कि श्याम बाबू साल भर से बाहर रहकर नौकरी करता था और घटना के समय उसे नहीं मिला था। अस्पताल में भी वह मौजूद नहीं था और न ही एम्बुलेंन्स में मौजूद था। श्याम बाबू की गिरफ्तारी के सम्बन्ध में विवेचक ने कहा है कि 14 जून 2016 को श्यामबाबू को गिरफ्तार किया गया। विवेचक ने यह भी नहीं बताया है कि इस अवधि में अभियुक्त कहां रहा? साथ ही उसकी लुधियाना उपस्थिति के सम्बन्ध में भी कोई साक्ष्य संकलित नहीं किये गए। इसी प्रकार महत्वपूर्ण साक्षी साबित होने वाले पड़ोसियों, जिनके द्वारा पीड़िता को प्रथम बार बचाने का प्रयास करना बताया गया तथा अभियुक्त की उपस्थिति का साक्ष्य संकलित नहीं किया गया, जो मृत्यु जैसे घटनाक्रम की दहेज हत्या या हत्या के सन्दर्भ में सरसरी तौर पर की गई विवेचना है। अदालत ने निर्णय की प्रति जिलाधिकारी तथा भारतीय चिकित्सा परिषद को भेजे जाने का निर्देश दिया है।
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