Sunday, March 22, 2026
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Gonda : इमरजेंसी के गेट पर प्रतीक्षा करते निकले प्राण!

बेटे की गोद में पिता ने तोड़ दिया दम, बाद में लगाया गया आक्सीजन

जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भी नहीं सुनते जिला अस्पताल के डाक्टर

आदरणीय उप मुख्यमंत्री जी! आखिर कब और कैसे सुधरेंगे धरती के यह भगवान

जानकी शरण द्विवेदी

गोंडा। धरती के भगवान कहे जाने वाले जिला चिकित्सालय के कुछ चिकित्सक और कर्मचारी बेलगाम हो गए हैं। उन्हें केवल पैसे से मतलब है। पैसा देकर हर संभव, असंभव काम हो जाएगा, किन्तु यदि आपके पास पैसा नहीं है, तो अस्पताल के गेट पर आपके मरीज की जान भी जा सकती है। ऐसा ही वाकया कल हुआ, जब एक पिता ने आपातकालीन वार्ड में आन ड्यूटी डाक्टर की लापरवाही से इमरजेंसी के गेट पर अपने बेटे की गोद में दम तोड़ दिया। औरों को तो छोड़िए, यहीं पर तैनात एक चिकित्सक ने एक दिन जिले के अपर पुलिस अधीक्षक तक को रुला दिया। उन्होंने अपनी मर्यादा में रहते हुए शिकायत भी की, किन्तु और सुने और कौन कार्रवाई करे। मानवता को शर्मसार करने वाली यह घटना बुधवार को दोपहरी करीब दो बजे के आसपास जिला चिकित्सालय की है। मोतीगंज थाना क्षेत्र के पिपरा भिटौरा गांव निवासी सोहन लाल अपने पिता बुजुर्ग राम उदित को सांस लेने में तकलीफ के कारण जिला अस्पताल लेकर आते हैं। उस समय यहां आपातकालीन वार्ड में भीड़ होने के कारण गेट के बाहर बरामदे में बैठा दिया जाता है और नंबर आने पर अंदर आने को कहा जाता है। सोहन लाल बताते हैं कि वह अपने बुजुर्ग पिता को गोद में लेकर काफी देर तक बैठे रहे, लेकिन किसी ने अंदर नहीं बुलाया। इस बीच पिता के शरीर में कोई हरकत न होने और सिर लटक जाने के बाद वह उन्हें लेकर बिना बुलाए ही आपातकालीन कक्ष में ले गए तो उन्हें आक्सीजन लगा दिया गया और कुछ देर बाद ही उनकी मौत हो जाना बताकर शव घर ले जाने का फरमान सुना दिया गया। उनका कहना है कि मौत हो उनकी मेरे गोद में ही हो गई थी, किन्तु मुझे गुमराह करने के लिए आन ड्यूटी डाक्टर ने उसे आक्सीजन लगवा दिया। इमरजेंसी कक्ष में से शव बाहर लाने के लिए उसे न तो स्ट्रेचर उपलब्ध कराया गया और न ही शव वाहन। बेटे ने पिता का शव गोद में उठाकर प्राइवेट गाड़ी में लादकर घर ले गया। जबकि जानकार बताते हैं कि अस्पताल में मौत होने पर शव घर ले जाने के लिए चार शव वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। बताते हैं कि जिलाधिकारी डॉ. उज्जवल कुमार के संज्ञान में प्रकरण आने पर उन्होंने प्रमुख चिकित्साधीक्षक डॉ. इंदुबाला से नाराजगी जताते हुए रिपोर्ट तलब की है। सीएमएस द्वारा मामले की जांच भी शुरू कराए जाने की खबर है। इमरजेंसी में तैनात चिकित्सक के साथ ही फार्मासिस्ट व अन्य कर्मचारियों से पूछताछ की गई है, किन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि इमरजेंसी में जिनकी ड्यूटी थी, वह थे ही नहीं। उनके स्थान पर दूसरे लोग काम कर रहे थे।

Gonda : इमरजेंसी के गेट पर प्रतीक्षा करते निकले प्राण!


अब दूसरा प्रकरण सुनिए। 31 जुलाई 2022 की देर शाम छपिया थाना क्षेत्र के मसकनवा में चाकूबाजी की घटना होती है। चार युवक गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए स्थानीय पुलिस व परिजन उन्हें छपिया सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर ले जाने के बजाय सीधे जिला अस्पताल पहुंचते हैं। जिले की बड़ी घटना होने के कारण वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी सतर्क हो गए। तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए मौके पर पीएसी तैनात कर दी गई और घायलों के बेहतर उपचार का प्रबंध करने के लिए अपर पुलिस अधीक्षक शिवराज भी रात में ही जिला अस्पताल पहुंच गए। गंभीर अवस्था में चारों युवकों के जिला अस्पताल पहुंचने पर आपातकाल वार्ड में ड्यूटी पर बताए जा रहे डा. मृणाल ने बिना सीएचसी से रेफर कराए सीधे अस्पताल पहुंचने पर यहां भर्ती करने से मना कर दिया। कहा कि बिना रेफरल के न तो भर्ती किया जा सकेगा और न ही उपचार शुरू होगा। एएसपी ने परिचय देकर डाक्टर को समझाने की कोशिश की किन्तु वह नहीं माना। बाद में उन्होंने सीएमओ को फोन करके घटना की जानकारी दी। सीएमओ ने भर्ती करके उपचार शुरू करने को कहा। फिर भी नहीं माना। कहा कि जिला अस्पताल के नियंत्रक प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक हैं, सीएमओ नहीं। इसके बाद उन्होंने सीएमएस से बात करवाई, तब जाकर चारों युवक भर्ती हुए और इलाज शुरू हुआ। किन्तु इस तू-तू मैं-मैं का नुकसान यह हुआ कि डाक्टर ने चाकू की गंभीर चोटों को शार्प इंजरी लिखा ही नहीं। बाद में पता चला कि हमलावर पक्ष पहले से डाक्टर को मैनेज कर चुका था। इस सब वाकया के दौरान जिले का एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी असहाय बना रहा। बाद में उन्होंने अपने स्तर से इसकी शिकायत भी की किन्तु अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। देखने को मिलता है कि आए दिन अस्पताल में बिना किसी पुलिस मेमो के ‘ब्राट बाइ सेल्फ’ लिखकर लोग चिकित्सीय परीक्षण करवाकर मनमाने तरीके से चोट लिखवा रहे हैं। एएसपी बताते हैं कि यदि किसी को गंभीर चोट नहीं है तो बिना पुलिस मेमो के उसका चिकित्सीय परीक्षण नहीं किया जा सकता। किन्तु यदि गंभीर चोटें हैं, तो बिना किसी पूछताछ के सबसे पहले उपचार शुरू करके उसके प्राण बचाने की कोशिश की जाएगी। उनका कहना है कि घटना की रात जिला चिकित्सालय में मुझे चिकित्सालय की इस कार्य प्रणाली पर काफी पीड़ा हो रही थी, किन्तु यदि मैं करता तो अगले दिन चिकित्सक और पैरा मेडिकल स्टाफ पुलिस के खिलाफ झण्डा बुलंद करते। इसलिए मैं चुप रह गया, किन्तु डाक्टरी तो बिल्कुल गलत हुई। प्रथम दृष्टया चाकुओं के घाव दिख रहे थे। इसके बाद भी वह चोटें नहीं लिखीं गईं।

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जानकी शरण द्विवेदी
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