Thursday, April 9, 2026
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Gonda:पूरा विश्व मनाएगा योग दिवस, रोएगी महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि

(अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष)

जानकी शरण द्विवेदी

गोंडा। सम्पूर्ण विश्व भले ही 21 जून को आठवें अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस को धूमधाम से मनाने की तैयारियों में जुटा हो, किन्तु इस अद्वितीय विद्या के प्रणेता महर्षि पतंजलि की जन्म भूमि अपनी उपेक्षा पर आंसू बहाने को बेवश है। वैसे तो जिला प्रशासन योग दिवस पर जिले में छह लाख लोगों को योग से जोड़ने का दावा कर रहा है, लेकिन उनकी जन्मभूमि पर शासकीय स्तर पर किसी प्रकार का आयोजन नहीं हो रहा है। महर्षि पतंजलि जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष डा. स्वामी भगवदाचार्य ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व वाली सरकार में भी एक महायोगी के जन्मभूमि की उपेक्षा उनकी समझ से परे है।
डा. भगवदाचार्य बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के वजीरगंज विकास खण्ड के कोंडर गांव में योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि है। यह स्थान अयोध्या से मात्र 35 किमी. की दूरी पर है। शेषावतार कहे जाने वाले महर्षि पतंजलि इसी गांव में मां गोणिका के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। उन्हें ज्ञान और भक्ति की प्राप्ति कोंडर झील के किनारे हुई थी। कहा जाता है कि शेषावतार माने जाने वाले पतंजलि त्रिजट ब्राह्मण थे। विद्वान सूत्रकार, वृत्तिकार और भाष्यकार को त्रिजट ब्राह्मणों की तीन जटाओं का प्रतीक मानते हैं। विश्व में महर्षि पतंजलि का अनोखा ‘भाष्य‘ प्रचलित है। यह अपनी शैली के कारण विश्व के अन्य ग्रंथों से सर्वथा भिन्न है। महर्षि ने अपने महाभाष्य में स्वयं को कई बार गोनर्दीय कहा है। बताते चलें कि महराजा दशरथ की गायों के स्वछंद विचरण के उपरांत नाद करने के कारण अयोध्या से सटे इस भूभाग को प्राचीन काल में गोनार्द कहा जाता था, जो बाद में बदलकर गोंडा हो गया। डा. भगवदाचार्य के अनुसार, महर्षि पतंजलि परदे के पीछे से अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे। अचानक एक शिष्य ने एक दिन पर्दा हटाकर उन्हें देखना चाहा, तो वे सर्पाकार होकर गायब हो गए। वे कोंड़र झील होते हुए विलुप्त हुए थे। इसलिए कोंडर गांव में विस्तारित इस झील का आकार भी सर्पाकार है। बाद में उन्होंने काशी के नागकुआं के पास अपनी कर्मभूमि बनायी। उनकी जन्म स्थली पर जन सहयोग से शिलापट लगा एक चबूतरा, सम्मय माता मंदिर व राम जानकी मंदिर है। मंदिर के पास सवा दो बीघा जमीन मंदिर के नाम है, उस पर भी आंशिक अतिक्रमण है। गांव के युवाओं को ग्राम प्रधान प्रतिनिधि विपिन सिंह व योग शिक्षक रवि शंकर दूबे योग भी सिखाते है। इस बात से सभी को कष्ट है कि लोग उनके नाम पर करोड़ों का व्यापार कर रहे है, किन्तु जन्मस्थली की सुधि किसी को नहीं है। डॉ. भगवदाचार्य कहते हैं कि उनके द्वारा बीते वर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सहित केंद्र व राज्य सरकार के कई मंत्रियों को पत्र भी लिखे गए। वर्ष 2016 में योग दिवस पर शासन के प्रतिनिधि के रूप में कोंडर पहुंचे तत्कालीन कृषि मंत्री स्व. विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह ने यहां एक भव्य व्यायामशाला बनवाए जाने के साथ ही महर्षि पतंजलि की सुन्दर प्रतिमा स्थापित कराने व प्रकाश व्यवस्था के लिए सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाए जाने की घोषणा की थी। मंदिर परिसर और कोंडर झील का भी सुन्दरीकरण कराकर पर्यटन योग्य बनाए जाने का ऐलान किया था, किन्तु सरकार बदलने के साथ ही उनके द्वारा की गई सारी घोषणाएं फाइलों में कैद होकर रह गईं। इसी प्रकार से कई बार जिले के वरिष्ठ अधिकारी भी यहां आए। सभी ने विकास का आश्वासन दिया किन्तु सब ढ़ाक के तीन पात रहा। कोई ठोस कार्य नहीं हो सका।
डा. भगवदाचार्य बताते हैं कि राजधानी लखनऊ से क़रीब 150 किलोमीटर दूर स्थित महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि पर दूरदराज से आने वाले आगंतुकों के लिए न तो कोई आश्रम या धर्मशाला है, और न ही पेयजल, विद्युत, आवागमन, स्वास्थ्य इत्यादि की अच्छी सुविधाएं। ज़रूरत है कि पतंजलि की जन्मभूमि को संरक्षित करके इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिलाया जाए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 में तत्कालीन जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने पतंजलि की जन्मस्थली के विकास के लिए रुचि लिया था। उन्होंने मण्डल मुख्यालय पर ऐतिहासिक वेंकटाचार क्लब परिसर में महर्षि पतंजलि स्पोर्ट्स काम्पलेक्स का निर्माण करवाया था। साथ ही जन्म स्थली के विकास के लिए अपर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति का भी गठन किया था, जिसे तीन माह में अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। किंतु उनके तबादले के बाद इस समिति ने क्या किया, इसकी कोई जानकारी उन्हें नहीं मिली। अखिलेश सरकार में राज्य मंत्री रहे योगेश प्रताप सिंह ने अपने विधानसभा क्षेत्र में महर्षि पतंजलि राजकीय पालिटेक्निक कालेज की नीव रखी थी, किन्तु सत्ता परिवर्तन होने के कारण सात साल बाद भी वह निर्माण अधूरा है। उन्होंने इस बात पर चिन्ता व्यक्त किया कि शासन के निर्देश पर जिले में इस बार जनपद, तहसील, विकास खंड और ग्राम पंचायत स्तर तक योग दिवस मनाया जा रहा है, किंतु कोंडर ग्राम में इस बार भी शासकीय स्तर पर कोई आयोजन नहीं हो रहा है। डा. भगवदाचार्य ने कहा कि पूर्व की भांति जन सहयोग से आसपास के क्षेत्रों में जन्मभूमि न्यास के तत्वाधान में शोभा यात्रा निकालकर लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। स्थानीय लोगों की उपस्थिति में योग शिविर का आयोजन होगा। पूर्वान्ह 11 बजे से एक संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। इसके बाद शाम को भण्डारे का आयोजन होगा।
क्षेत्रीय भाजपा विधायक प्रेम नारायण पाण्डेय का कहना है कि उनके प्रयासों के चलते परिक्रमा मार्ग से जन्मभूमि को सड़क मार्ग से जोड़ने की मंजूरी मिल चुकी है। अयोध्या से सटा क्षेत्र होने के कारण इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिलवाकर इसका विकास कराया जाएगा, जिससे देश विदेश से भगवान राम की जन्म भूमि के दर्शनार्थ आने वाले सैलानी योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि की जन्म भूमि को भी देख सकें। जिलाधिकारी डा. उज्ज्वल कुमार का कहना है कि इस बार शासन से जिले में छह लाख लोगों को योग से जोड़ने का लक्ष्य मिला है। इसके लिए जिला, तहसील, विकास खण्ड से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक रोड मैप तैयार किया गया है। जिला आयुर्वेद एवं यूनानी विभाग से जुड़े योग प्रशिक्षकों के माध्यम से जिले भर में अभियान चलाकर ग्राम पंचायत स्तर पर प्रशिक्षक तैयार किए गए हैं। उन्हीं के माध्यम से जिले के 1214 ग्राम पंचायतों तथा सात नगर निकायों में अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस पर योग शिविर आयोजित किए जाएंगे। मुख्य आयोजन जिला मुख्यालय पर पीएसी ग्राउण्ड पर होगा, जहां जनप्रतिनिधियों के अलावा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। इसके अलावा भी मुख्यालय पर कई स्कूल, कालेजों और पार्कों में योग शिविर लगेगा। हम लक्ष्य से ज्यादा लोगों को योग से जोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। कोंडर की ग्राम प्रधान श्रीमती गीता सिंह का कहना है कि महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि पर कराए जाने वाले विकास कार्यों के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध है। यहां मंदिर के नाम से ढ़ाई बीघा जमीन है। इससे सटी इतनी ही जमीन आबादी के नाम दर्ज है। इस प्रकार से मंदिर के आसपास ही एक एकड़ की जमीन उपलब्ध है। करीब 50-60 एकड़ क्षेत्रफल का एक ही भूभाग ग्राम समाज के नाम दर्ज है। इस पर कोई बड़ा संस्थान विकसित किया जा सकता है। इसके अलावा 17 हेक्टेयर के दो अन्य भूभाग ग्राम समाज के उपलब्ध हैं। करीब 12 किमी. क्षेत्रफल में तो कोंडर झील ही विस्तारित है, जिसका एक बड़ा हिस्सा जल प्लावन क्षेत्र से हटकर है। आवश्यकतानुसार उसका भी उपयोग किया जा सकता है। उन्हांने कहा कि वन्य जीव संरक्षण कानून लागू करके कोंडर झील को संरक्षित किया जाना चाहिए। यहां बहुत ही सुंदर-सुंदर देशी विदेशी पक्षी आते रहते हैं, जिनका स्थानीय लोग शिकार करते हैं। इसी प्रकार से चोरी छिपे झील में रहने वाली मछलियों का भी आखेट होता रहता है।

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