शादी के सात दिन बाद ही चरम पर पहुंच गया देवर भाभी का प्यार
पति को छोड़कर देवर के साथ रहने की जिद ठान ली नवविवाहिता, परिवार झुका
संवाददाता
अयोध्या। अंबेडकर नगर जिले में देवर भाभी का प्यार एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार मामला बेहद चौंकाने वाला है। शादी के महज सात दिन बाद विवाहिता ने अपने पति को छोड़कर देवर के साथ जीने की जिद ठान ली। यह emotional twist न केवल रिश्तों की पारंपरिक सोच को झकझोरने वाला है, बल्कि समाज और कानून दोनों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी करता है।
देवर भाभी का प्यार: सात दिन में टूटा शादी का बंधन
आंबेडकरनगर जिले के हंसवर थाना क्षेत्र के एक गांव में यह हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है, जहां पांच मई को धूमधाम से शादी हुई थी। शादी के बाद दुल्हन ससुराल आई, लेकिन एक हफ्ते के भीतर ही देवर भाभी का प्यार परवान चढ़ गया। विवाहिता की नजरें देवर से क्या मिलीं, मानो भावनाओं का समंदर बह निकला। जब वह मायके लौटी, तो परिवार वालों को चौंकाते हुए कहा कि वह अब पति के साथ नहीं, बल्कि देवर के साथ रहना चाहती है।
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पुलिस तक पहुंचा मामला, फिर भी नहीं बदली जिद
जब विवाहिता ने यह फैसला परिवार के सामने रखा, तो पूरा माहौल सन्नाटे में डूब गया। पहले पंचायत बैठी, फिर पुलिस बुलाई गई। लेकिन, विवाहिता अपने निर्णय पर अडिग रही। देवर भी पीछे नहीं हटा और उसने भी भाभी के साथ जीने-मरने की कसमें खा लीं। देवर भाभी का प्यार अब केवल एक भावना नहीं, बल्कि सार्वजनिक घोषणा बन गया था। थाने में दुल्हन ने साफ कहा कि वह पति के साथ नहीं, देवर के साथ रहना चाहती है।
बालिग होने के कारण पुलिस ने रोका कदम
पुलिस ने मामले में कोई कानूनी हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि दोनों बालिग थे और परिवार वाले भी किसी तरह की कार्रवाई नहीं चाहते थे। हंसवर थाना प्रभारी वीरेंद्र बहादुर सिंह ने स्पष्ट किया कि यह एक पारिवारिक मामला है और कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है। अंततः पति ने भी भारी मन से पत्नी को छोटे भाई के साथ रहने की अनुमति दे दी। इस प्रकार देवर भाभी का प्यार सामाजिक और पारिवारिक बंधनों को तोड़ता हुआ एक नया रिश्ता बन गया।

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सोशल बंधनों की अनदेखी
गांव हो या शहर, इस तरह की घटनाएं समाज में बहस और विवाद को जन्म देती हैं। खासकर जब देवर भाभी का प्यार रिश्तों की सीमाएं लांघता है, तब सवाल खड़े होते हैं क्या यह भावनात्मक स्वतंत्रता है या पारिवारिक व्यवस्था पर हमला? जहां एक ओर कुछ लोग इस निर्णय को ‘व्यक्तिगत आज़ादी’ कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक सोच रखने वाले इसे सामाजिक असंतुलन मान रहे हैं।
समाज के लिए चेतावनी या नई सोच का संकेत?
यह घटना समाज को सोचने पर मजबूर करती है क्या हमारी पारंपरिक विवाह संस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि केवल सात दिन में वह टूट सकती है? क्या भावनाओं की तात्कालिकता रिश्तों की गहराई पर हावी हो रही है? देवर भाभी का प्यार अब सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है।

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