Tuesday, January 13, 2026
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चाइल्ड केयर लीव : महिला जज को हाईकोर्ट ने किया वंचित

सुप्रीम कोर्ट सख्त! कहा-चाइल्ड केयर लीव पर भारी अन्याय

चाइल्ड केयर लीव के अधिकार को नकारने पर सरकार और HC से मांगा जवाब

लीगल डेस्क

नई दिल्ली। चाइल्ड केयर लीव जैसे संवेदनशील और महिला अधिकारों से जुड़े मसले पर एक गंभीर विवाद उभर कर सामने आया है। झारखंड की एक महिला जिला जज को उनके बच्चे की देखभाल के लिए छह माह की छुट्टी नहीं दी गई, जिसे लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को झारखंड सरकार और रांची हाईकोर्ट को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है कि आखिर क्यों एक योग्य महिला न्यायिक अधिकारी को चाइल्ड केयर लीव देने से इनकार किया गया।

यह मामला कशिका एम प्रसाद नामक अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश का है, जिन्होंने तबादले के बाद 10 जून से दिसंबर तक के लिए चाइल्ड केयर लीव मांगी थी। प्रशासन ने उन्हें छुट्टी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सिंगल मदर हैं महिला जज, लेकिन नहीं मिला संवेदनशीलता का सम्मान
महिला जज ने अदालत को बताया कि वह एक सिंगल मदर हैं और अनुसूचित जाति समुदाय से आती हैं। उनके करियर की बात करें तो उन्होंने महज ढाई साल में 4,660 मामलों का निपटारा किया है। बावजूद इसके उन्हें चाइल्ड केयर लीव जैसे मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया गया।

सुनवाई के दौरान जब अधिवक्ता ने यह बताया कि याचिकाकर्ता न केवल सिंगल मदर हैं बल्कि वंचित समुदाय से हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से मामले को लिया। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह सवाल उठाया कि क्या याचिकाकर्ता विधवा हैं। अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि वह केवल एकल अभिभावक हैं, विधवा नहीं।

चाइल्ड केयर लीव कानूनन अधिकार, फिर क्यों किया गया इनकार?
भारतीय कानून के अनुसार, महिला कर्मचारियों को चाइल्ड केयर लीव के तौर पर 730 दिनों तक का अवकाश मिल सकता है। महिला जज ने मात्र 6 माह की छुट्टी मांगी थी, जो कि कानूनन पूरी तरह वैध है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर ग्रीष्मकालीन अवकाश के बावजूद फौरन सुनवाई करते हुए झारखंड सरकार और रांची हाईकोर्ट से यह पूछा है कि आखिर इस संवेदनशील अनुरोध को किस आधार पर ठुकरा दिया गया।

हाईकोर्ट से पहले सुप्रीम कोर्ट क्यों?
इस प्रश्न पर जब पीठ ने अधिवक्ता से पूछा कि उन्होंने पहले हाईकोर्ट क्यों नहीं गए, तो अधिवक्ता ने कहा कि हाईकोर्ट ग्रीष्मकालीन अवकाश के कारण तत्कालिकता को गंभीरता से नहीं लेता। ऐसे में चाइल्ड केयर लीव जैसे समयबद्ध अधिकार को लेकर देरी नहीं की जा सकती थी।

पीठ ने यह निर्देश दिया कि प्रतिवादी पक्ष को इलेक्ट्रॉनिक सहित सभी माध्यमों से नोटिस जारी किए जाएं और अगली सुनवाई में उनका जवाब दाखिल कराया जाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले को लंबित नहीं रखा जाएगा, बल्कि शीघ्र निपटारा किया जाएगा।

न्यायपालिका में महिला अधिकारियों की स्थिति पर बड़ा प्रश्नचिह्न
चाइल्ड केयर लीव का यह विवाद केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्यायपालिका में महिला अधिकारियों की स्थिति पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। एक सिंगल मदर, वंचित समुदाय की जज, जिन्होंने शानदार सेवाएं दी हैं, उन्हें अवकाश देने से इनकार कर देना न्याय और संवेदनशीलता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

चाइल्ड केयर लीव : महिला जज को हाईकोर्ट ने किया वंचित

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