Sunday, February 8, 2026

ग़ज़ल…….

ग़ालिब-ओ-मीर सी ग़ज़लों में ग़र मस्ती नहीं होती ,
सुखनवर हो के भी अपनी कोई हस्ती नहीं होती।

कभी मंदिर ठिकाना है कभी मस्जिद ठिकाना है,
परिंदों की कभी अपनी कोई बस्ती नहीं होती।

मुहब्बत कर लिया जिसने वही तो जान पाया है,
मुहब्बत दर्द है जिसमें कभी मस्ती नहीं होती।

अगर पहले पता होता तो कब का मौत पा लेता,
मैं जीकर जिन्दगी समझा क़ज़ा सस्ती नहीं होती।

नहीं होता कभी अहसास यूँ इश्के- हकीकी का,
कलंदर सी अगर दिल में बसी मस्ती नहीं होती।

कहाँ उस पार जा पाता भँवर में डूब ही जाता,
तुम्हारे हाथ में ग़र प्यार की कश्ती नहीं होती।

तुम्हीं से गुल है ’गुलशन’ में तुम्हीं से रंगो-खुश्बू भी,
जहाँ पर तुम नहीं होते मेरी हस्ती नहीं होती।
-अशोक ’गुलशन ’

RELATED ARTICLES

Most Popular