सैकड़ों साल पुरानी परम्परा में परेवा को नहीं मनाई जाती होली
हमीरपुर (हि.स.)। बुंदेलखंड क्षेत्र में होली जलने के बाद लोग शोक में होली का रंग नहीं खेलते हैं। परेवा के दिन पूरे क्षेत्र में अंझा रहता है जिससे शहर से लेकर गांवों में होली के त्योहार पर सन्नाटा पसरा रहता है। भैया दूज की पूजा होते ही यहां बुंदेली लोगों में होली की धूम मचती है।
लेखक और कवि गणेश सिंह विद्यार्थी ने आज यहाँ होलिका दहन के अगले दिन यानी परवा को जनपद हमीरपुर में अंझा रहने का कारण की जानकारी देते हुए बताया कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की रात होलिका दहन के पश्चात परवा से ही पूरा हिंदुस्तान रंगों व अबीर-गुलाल की होली खेलता है वहीं पूरे बुंदेलखंड खासतौर से हमीरपुर, महोबा और झाँसी में होलिका दहन के पश्चात परवा के दिन अंझा रहता है। अंझा का तात्पर्य शोक से है, उस दिन रंग-गुलाल की होली नहीं खेली जाती। सर्वत्र एक अजीब तरह का सन्नाटा छाया रहता है। उन्होंने आगे बताया कि होलिका दहन के अगले दिन वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के पति राव गंगाधर की मृत्यु हो गयी थी। बुंदेलों ने परवा को होली न खेलकर अपने राजा की मृत्यु पर शोक जताया। तभी से पूरे बुंदेलखंड में परवा के दिन अंझा रहता है। यहाँ दूज से रंग-गुलाल की होली खेली जाती है जो रंग पंचमी तक चलती है, बल्कि बुंदेलखंड में कहीं-कहीं आठें तक होली खेली जाती है।
उन्होंने बताया कि कतिपय सुदूर बीहड़ गांवों में कहीं-कहीं कुछ युवा लोग परवा को धुरेड़ी, कीच और कपड़ा फाड़ होली खेलते रहे हैं। कस्बों में धुरेड़ी, कीच और कपड़ा फाड़ होली की यह प्रथा बंद सी हो गयी है। कही-कहीं बच्चे जरूर खेलते नजर आ जाते हैं। उन्हें इसके नुकसान बताए जाते हैं। जिससे अब ज्यादातर लोग इस तरह की होली खेलना पसंद नहीं करते, इसलिए धुरेड़ी की होली खेलने में रोक लगने के साथ कमी आई है, जो पर्यावरण एवं लोक संस्कृति के संरक्षण की दृष्टि से अच्छा ही है। उन्होंने जनपदवासियों को होली की शुभ कामनाएं एवं बधाई देते हुए सिंथेटिक रंगों आदि से बचाव करते हुए समस्त होरियारों, फगुवारों, नागरिकों एवं बच्चों से पूरी ख़ुशी, प्रसन्नता, उमंग, तरंग तथा पुरे उत्साह के साथ होली खेलने का आग्रह निवेदन किया है।
मथुरा में पंद्रह, कानपुर में आठ और बुंदेलखंड में रंग पंचमी तक अर्थात पांच दिनों तक होली खेलने की परंपरा है, लेकिन आधुनिकता एवं व्यक्ति के समय की व्यस्तता के कारण अब यह परंपरा औपचारिक रूप अख्तियार करती जा रही है। यहां के इतिहासकार डा.भवानीदीन प्रजापति ने बताया कि आज के ही दिन बुन्देलखंड की सामाजिक क्रांति योद्धा सावित्री बाई फूले का निधन हुआ था वहीं वीरांगना लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर को भी लोग याद करते है। उन्होंने बताया कि बुन्देलखंड में होली की परेवा को इसीलिये अंझा रहता है क्योंकि ये दिन शोक का है जिसमें रंगों से लोग दूर रहते हैं। हालांकि अब यह परम्परा नयी पीढ़ी के लोगों में टूटती जा रही है।
होली की परेवा के दिन रानी लक्ष्मीबाई के पति का हुआ था निधन
बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर का निधन होली की परेवा के दिन हो गया था। जिससे समूचे बुंदेलखंड क्षेत्र शोक में डूब गया था। झांसी के वरिष्ठ पत्रकार रवि शर्मा ने बताया कि अंग्रेजों को छठी का दूध याद दिलाने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर बीमार थे। उनका निधन ऐसे समय पर हो गया था जब होलिका दहन के अगले दिन परेवा थी। परेवा के दिन वीरांगना के पति के निधन से बुंदेलखंड में शोक मनाया गया। कहीं भी होली का रंग नही खेला गया था। शहर से लेकर गांव तक शोक के कारण सन्नाटा पसरा रहा। बताया कि तभी से इस क्षेत्र में परेवा को होली का त्योहार नहीं मनाने की परम्परा पड़ी और आज भी लोग उसका निर्वहन कर रहे है।
पंकज/सियाराम
