Saturday, April 4, 2026
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हाईकोर्ट ने गंगा की सफाई में खर्च हुए पैसे का मांगा हिसाब

–कहा, विभाग अपनी जवाबदेही को शटलकाॅक तरह शिफ्ट कर रहे हैं

–गंगा सफाई में लगे विभागों के कार्य आंखों में धूल झोंकने वाला है

प्रयागराज (हि.स.)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा प्रदूषण के मामले में सुनवाई करते हुए जल निगम, उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित अन्य विभागों की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी की है। कहा विभाग अपनी जवाबदेही को शटलकॉक की तरह शिफ्ट कर रहे हैं। जल निगम के पास पर्यावरण विशेषज्ञ नहींं फिर वह पर्यावरण की निगरानी कैसे कर रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने की जिम्मेदारी प्राइवेट कम्पनी को सौंप दिया है और स्वयं अक्षम अधिकारी के मार्फत निगरानी कर रहा है। कोर्ट ने तीखी नाराजगी जताई।

कोर्ट ने महानिदेशक नेशनल मिशन क्लीन गंगा से उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी है और पूछा है कि नमामि गंगे परियोजना के तहत अब तक कितना पैसा खर्च किया है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जांच रिपोर्ट मांगी है। बोर्ड ने एसटीपी की जांच के लिए 28 टीमें गठित की है।

कोर्ट ने यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से टेस्टिंग, शिकायत निस्तारण व अधिकारियों के खिलाफ अभियोग चलाने की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही पूछा कि गंगा जिन शहरों से होकर गुजरती हैं, वहां पर बने नालों को एसटीपी से जोड़ा गया या नहीं। उन्होंने इस सम्बंध में यूपी जल निगम, जल निगम अर्बन से हलफनामे पर जानकारी देने को कहा है।

यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अजीत कुमार की फुल बेंच ने गंगा प्रदूषण के मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने सुनवाई केदौरान गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने में आपसी तालमेल बनाकर काम न करने पर नाराजगी जताई। कहा कि मामले में विभाग अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का सही से जवाब देने की बजाय शॅटल कॉक की तरह एक-दूसरे के पाले में डाल रहे हैं। जबकि, हकीकत में विभागों के कार्य आंखों में धूल झोंकने वाले हैं। कोर्ट ने उन शहरों के साइट प्लॉनों को भी देखा जहां से गंगा गुजरी है। कोर्ट को बताया गया कि यूपी में गंगा 15 शहरों से गुजरती हैं। उसके लिए साइट प्लान की रिपोर्ट प्रमुख सचिव नमामि गंगे की ओर से दाखिल किया गया है। इन शहरों में 74 नाले हैं, जो गंगा में गिर रहे हैं। इस पर कोर्ट ने अपर महाधिवक्ता नीरज त्रिपाठी से पूछा कि इन शहरों की एसटीपी से शहरों के नालों को जोड़ा गया है कि नहीं। इस पर न्यायमित्र अरुण गुप्ता ने कहा कि प्रयागराज सहित अन्य जिलों में तकरीबन 58 से 60 फीसदी कनेक्ट किया गया है। तीन जिलों में बलिया, प्रतापगढ़ सहित तीन जिलों में एसटीपी नहीं बनी हैं। कानपुर की ट्रेनरियों को कहीं शिफ्ट नहीं किया गया। इतने पैसे खर्च करने के बावजूद गंगा की स्थिति जस की तस है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लॉट (एसटीपी) की मॉनिटरिंग भी सहीं तरीके से नहीं हो पा रही है।

एसटीपी का संचालन निजी एजेंसी के जरिए कराया जा रहा है लेकिन हालत यह है कि संचालित एसटीपी ओवरफ्लो है। निगमों के पास कोई पर्यावरण इंजीनियर नहीं है। सुनवाई के दौरान नेशनल गंगा मिशन, जल निगम, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित अन्य विभागों की ओर से आदेश के बावजूद मामले में जवाब दाखिल न करने पर कोर्ट ने तीखी नाराजगी जताई।

इन विभागों की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया। इस पर कोर्ट ने कहा कि वह मामले को लटकाना नहीं चाहती है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एसटीपी से लिए गए 29 नमूनों की रिपोर्ट मांगी तो बताया गया कि अभी जांच रिपोर्ट नहीं आई है। कोर्ट ने प्रयागराज में होने वाले कुंभ, माघ मेला के दौरान गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था जानी तो बताया गया कि मोबाइल एसटीपी के जरिए जल का शुद्धिकरण किया जाता है। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अधिवक्ता वीसी श्रीवास्तव ने बताया कि उन्होंने प्रयागराज के सात स्थानों से जल की जांच कराई है लेकिन सभी जांच फेल हो गए हैं। पानी सही नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी एसटीपी बंद कर देना चाहिए। कोर्ट ने प्रयागराज नगर निगम के अधिवक्ता से एसटीपी से हो रहे शोधन की रिपोर्ट के बारे में पूछा। उन्होंने मामले में हलफनामे पर जवाब दाखिल करने को कहा है।

आर.एन

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