लखनऊ में जाड़े के दिनों में कश्मीर से आए हैं मेवा और ऊनी कपड़े बेचने वाले
लखनऊ (हि.स.)। हम तो व्यापारी हैं, हमें सियासत से क्या मतलब । हम तो यहां चार पैसे कमाने आए हैं। यह कहना है कश्मीर से लखनऊ में मेवा बेचने आए मो. फारूख का। जाड़े के मौसम में शहर में सौ से ज्यादा मेवे के छोटे व्यापारी आए हुए हैं। ये लोग गोमती नगर में नदी के पुल के फुटपाथ पर अपना सामान सजाए हुए हैं । राह में आते-जाते वाहन गाड़ी रोककर उनसे मेवे खरीदते हैं। उधर इतनी ही संख्या में कश्मीर से ऊनी स्वेटर, शॉल और जैकेट बेचने वाले भी शहर में आए हुए हैं। ये लोग फेरी भी लगाते हैं और कहीं फुटपाथ या मेले में दुकान भी सजा लेते हैं।
शहर में जाड़े को दिनों में मेवे की बिक्री बढ़ जाती है। यहां के वासी ठंड से बचने के लिए मेवा खाना पसंद करते हैं। इसी को ध्यान में रखकर कश्मीर से मेवा बेचने वाले यहां अपने सामान को ले आते हैं। मेवे की दुकान सजाए फारूख बताते हैं कि हम यहां पहली नवम्बर से आ जाते हैं और फरवरी के अंत तक रहते हैं। इनकी दुकान में किशमिश, छुहारा, बादाम, काजू, अंजीर, केसर, अखरोट सहित और भी चीजें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।
फारूख बताते हैं कि वह श्रीनगर में रहते हैं। इस समय कश्मीर में बहुत ठंड पड़ती हैं। रास्तों पर बर्फ जम जाती है। रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं। इस कारण से सारा कारोबार ठप्प पड़ जाता है। वह कहते हैं कि अगर चार पैसा कमाना है तो घर छोड़कर कहीं बाहर जाना ही पड़ेगा। यहां मेवा ले आते हैं। बेचते हैं। चार महीने रहकर वापस अपने घर चले जाते हैं। वह बताते हैं कि दस सालों से यहां आ रहे हैं।
सेब के बाग और अखरोट के खेत के मालिक फारूख व्यापार से हट के एक सवाल पर बताते हैं कि कश्मीर में शांति है। वहां का माहौल अच्छा है। कोई फसाद नहीं है। उन्होंने बताया कि फसाद सियासदार लोग अपने वोटों के लिए कराते हैं। एक आम आदमी को इन सब बातों से क्या मतलब ?
बताया कि जो खबरे यहां सुनाई पड़ती हैं,वह बार्डर एरिया से आती हैं। वहां आतंकवाद बहुत कम हुआ है। बाहर से टूरिस्ट भी आने लगे हैं। अंत में वह कहते हैं कि हम तो कारोबारी है,ं हमें तो चार पैसा कमाना है।
कश्मीर के मुश्ताक बताते हैं कि यहां ऊनी कपड़े लाए हैं। हमारे पास शॉल, ऊनी स्वेटर, जैकेट , फरन आदि हैं। हम यहां जाड़े में चार पैसा कमाने आते हैं। बाकी बातों से हमें क्या लेना-देना। कश्मीर में सब ठीक है।
शैलेंद्र मिश्रा
