Thursday, March 26, 2026
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स्वामी विवेकानंद ने बजाया था भारतीय अध्यात्म का डंका

शिकागो वक्तृता दिवस पर विशेष

योगेश कुमार गोयल

अपने ओजस्वी विचारों और आदर्शों के कारण सदैव युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्त्वि के धनी माने जाते रहे स्वामी विवेकानंद 39 वर्षों के अपने छोटे से जीवनकाल में समूचे विश्व को अपने अलौकिक विचारों की ऐसी बेशकीमती पूंजी सौंप गए, जो आने वाली अनेक शताब्दियों तक समस्त मानव जाति का मार्गदर्शन करती रहेगी। 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे नरेन्द्र नाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से विख्यात हुए, जो आधुनिक मानव के ऐसे आदर्श प्रतिनिधि और महान व्यक्तित्व थे, जिनकी ओजस्वी वाणी युवाओं के लिए सदा प्रेरणास्रोत बनी रही। युवा शक्ति का आह्वान करते हुए उन्होंने एक मंत्र दिया था, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ अर्थात् ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि मंजिल प्राप्त न हो जाए।’

ऐसा अनमोल मूलमंत्र देने वाले स्वामी विवेकानंद ने सदैव अपने क्रांतिकारी और तेजस्वी विचारों से युवा पीढ़ी को ऊर्जावान बनाने, उसमें नई शक्ति एवं चेतना जागृत करने और सकारात्कमता का संचार करने का कार्य किया। उन्होंने ऐसे वैश्विक समाज की कल्पना की थी, जिसमें देश, धर्म, नस्ल या जाति के आधार पर इंसान-इंसान में कोई भेद न किया जाता हो। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और बहुत कम उम्र में ही उन्होंने वेदों तथा दर्शन शास्त्र का ज्ञान हासिल कर लिया था।

11 सितम्बर 1893 को शिकागो के ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ में हिन्दू धर्म पर अपने प्रेरणात्मक भाषण की शुरुआत जब उन्होंने ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ के साथ की थी तो बहुत देर तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही थी। अपने उस भाषण के जरिये उन्होंने दुनियाभर में भारतीय अध्यात्म का डंका बजाया था और उसके बाद विदेशी मीडिया तथा वक्ताओं द्वारा भी स्वामीजी को धर्म संसद में सबसे महान् व्यक्तित्व एवं ईश्वरीय शक्ति प्राप्त सबसे लोकप्रिय वक्ता बताया जाता रहा। यह स्वामी विवेकानंद का अद्भुत व्यक्तित्व ही था कि वे यदि मंच से गुजरते भी थे तो तालियों की गड़गड़ाहट होने लगती थी।

मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं, जिन्होंने यह व्यक्त किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूर्व के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी और जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।’’

शिकागो सम्मेलन को उस समय तक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक बताते हुए उन्होंने गीता के उपदेशों का भी उल्लेख किया था, जिनमें कहा गया है कि जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं, लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं। अपने प्रेरक भाषण में विवेकानंद ने कहा था कि जिस प्रकार अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है। ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हों लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं।

जब विवेकानंद शिकागो धर्म संसद से भारत वापस लौटे तो उन्होंने समस्त देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से, निकल पड़े झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों और पर्वतों से।’’ उनके इस आह्वान के बाद कांग्रेस को स्वाधीनता संग्राम में देशवासियों का भरपूर समर्थन मिला और इस प्रकार वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के भी बहुत बड़े प्रेरणास्रोत बने।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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