बलिया (हि. स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उज्ज्वला योजना के माध्यम से बीपीएल परिवारों के आंखों में गरीबी के धुंए की जगह खुशहाली के सपने संजोने का प्रयास किया था। शायद यही वहज है कि उन्होंने यूपी के महोबा से इसके दूसरे फेज की शुरुआत की है। प्रधानमंत्री मोदी की इस अहम योजना को ”सुखेत” मॉडल से पंख लग सकते हैं।
डा. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के कुलपति बलिया निवासी डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव के सुखेत मॉडल से न सिर्फ धुंआ रहित खाना पकाना सम्भव है, बल्कि इसे स्वच्छता और रोजगार का जरिया भी बनाया जा सकता है।
जन नायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने गृह जनपद आए पूसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डा. रमेश श्रीवास्तव ने बुधवार को ”हिन्दुस्थान समाचार” से विशेष बातचीत में कहा कि उज्ज्वला योजना के तहत देश में आठ करोड़ बीपीएल परिवारों को एलपीजी सिलेंडर और गैस चूल्हा मुफ्त में दिया गया है। लेकिन देश का आर्थिक और सामाजिक ढांचा ऐसा है कि ज्यादातर गरीब परिवारों में गोबर के उपले या लकड़ी के ईंधन से ही भोजन पकाया जाता है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत आच्छादित परिवारों में से महज आधे ही गैस रिफिल करा पाते हैं।
डा. श्रीवास्तव ने कहा कि हमने सोचा कि गैस सिलेंडर होने के बावजूद बीपीएल परिवारों की ये महिलाएं जिन साधनों से खाना बनाती हैं, क्यों न हम उन्हें उसके बदले मुफ्त में सिलेंडर दें। ताकि देश में धुंआ रहित खाना बनाने का सपना साकार हो सके। इसके लिए हमने बर्मी कंपोस्ट बनाने का निर्णय लिया। बिहार के मधुबनी जिले के सुखेत गांव में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसकी शुरुआत इसी वर्ष फरवरी में हुई।
सुखेत गांव में कुल 56 बीपीएल परिवारों को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत फ्री गौस कनेक्शन दिए गए हैं। इसमें गैस चूल्हा और पहला गैस रिफिल फ्री होता है। वहां इसकी शुरुआत हुई और आज उन 56 परिवारों को दो चक्र गौस सिलेंडर मुहैया कराया गया है। बीच में कोरोना की दूसरी लहर आ गई। अन्यथा कई और जगहों पर इसका विस्तार हो गया होता। फिलहाल मोकामा और सुपौल में दो एनजीओ के माध्यम से इसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा। अक्टूबर में काम शुरू हो जाएगा।
क्या है सुखेत मॉडल ?
पूसा विवि के कुलपति डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत मधुबनी के सुखेत गांव में इसकी शुरुआत की थी। इसके तहत सुखेत गांव में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से आच्छादित 56 बीपीएल परिवारों से प्रति परिवार बीस किलो गोबर प्रतिदिन, उनके घर रोजाना पैदा होने वाला कूड़ा, लकड़ी वगैरह,ल और गांव में रोजाना निकलने वाला वेस्ट मिलाकर बर्मी कंपोस्ट बनाया जाता है। उसकी बिक्री से दो महीने में एक परिवार को एक सिलेंडर की रिफिल कराया जा रहा है। इस योजना के संचालन के लिए कूड़ा उठाने वाली दो ट्राली, एक चारा मशीन, एक बड़ा ट्रेडर और गांव में कहीं पर दो गुणे दो मीटर का एक जगह चयनित कर लिया जाता है।
सरकारी योजनाओं के जरिए बलिया में भी फायदेमंद हो सकता है सुखेत मॉडल
सुखेत मॉडल के जनक डा. रमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि मैं बलिया का निवासी हूं। मेरी प्रबल इच्छा है कि मेरे गृह जिले में भी सुखेत मॉडल के तहत गरीब परिवारों को सम्बल दिया जा सके। कहा कि बलिया में यदि मनरेगा, स्वच्छता अभियान और जैविक कृषि की योजनाओं से धन मिले तो सुखेत मॉडल पर काम किया जा सकता है।
स्वच्छता, मिट्टी की उर्वरा शक्ति संग मिलेगा रोजगार
डा. रमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि सुखेत मॉडल के तहत देश की कई समस्याओं का एक साथ अंत किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने सपना देखा है कि देश की महिलाओं के आंखों में धुंआ न लगे। इसीलिए उन्होंने उज्ज्वला योजना की शुरुआत की। लेकिन इस योजना का पूरा लाभ वे महिलाएं नहीं ले पा रहीं, जिनके लिए यह शुरु किया गया। कहा कि सुखेत मॉडल के तहत गैस सिलेंडर उपलब्ध होगा तो धुंआ रहित खाना बनाना शत-प्रतिशत सम्भव होगा। यही नहीं गांवों में लोग रोजाना अपने घरों के कूड़े फेंकते हैं तो गंदगी भी एक बड़ी समस्या होती है। इस मॉडल के तहत कूड़ा स्वतः ही निस्तारित हो जाएगा। इसलिए स्वच्छता अभियान को भी आगे बढ़ाया जा सकेगा। इसके साथ ही बर्मी कंपोस्ट बनेगा तो गांवों में मिट्टी की उर्वरा शक्ति में बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा देश की अहम समस्या बेरोजगारी भी सुखेत मॉडल से दूर होगी। उन्होंने कहा कि एक गांव में एक योजना के तहत पांच लोगों को रोजगार मिलता है।
