सरन घई
दो लोग बस में यात्रा कर रहे थे। पड़ोस में बैठे थे तो बातचीत का सिलसिला चल पड़ना स्वाभाविक था। एक ने दूसरे से पूछा कि तुम क्या करते हो? दूसरे ने थोड़ा गर्व से जवाब दिया, मैं कवि हूँ। पहला बोला, वो तो ठीक है लेकिन करते क्या हो? मेरा मतलब है अपना व परिवार का पेट भरने के लिये, रोजी-रोटी के लिये क्या करते हो? कवि महोदय की घिग्घि बंध गई। बोले, बस यही करता हूँ। कितने पैसे कमा लेते हो? हमारे कविता संसार में पैसे की बात केवल बड़े-बड़े नामी कवि या फ़िल्मी लेखक/गीतकार करते हैं। हम छोटे कवियों को तो पहले अपनी पहचान बनानी पड़ती है। और जब पहचान बन जाती है तब क्या मिलता है? तब बस का किराया मिलता है। कवि सम्मेलन के दौरान चाय और समोसे। कभी-कभी जलेबी भी मिलती है। बस! उससे तुम्हारा पेट तो भर जाता है लेकिन परिवार का? कवि महोदय तनिक रुआंसे से होकर बोले, कवि सम्मेलन में मिलने वाली तालियां और कुछ करने ही नहीं देतीं। घर के लोग पिताजी और बड़े भैया की आय पर जीवित हैं। और तुम्हारी पत्नी? वो तो अपनी इच्छाओं के लिये आशा भरी निगाहों से तुम्हारी ओर देखती होगी! उसके लिये क्या बचे हुए समोसे बंधवा कर ले जाओगे कवि सम्मेलन के आयोजन कर्ता को याचना करके? तो क्या करें? कविता करना छोड़ दें? कविता हमारा शौक है, हमारी पहचान है, हमारा मान-सम्मान है। हम पर सरस्वती का आशिर्वाद है। नहीं, कविता करना तो तुम्हारी बौद्धिक गुणवत्ता का प्रतीक है लेकिन इसमें तुम्हारे समय और श्रम का मूल्य शामिल नहीं है। बेहतर है अपने शौक को व्यावसायिकता का मोड़ दो। जब कवि कविता के आधार पर कमाने भी लग जायेंगे, कोई इसे फालतू का काम या दिमाग की फलहीन चकल्लस नहीं कहेगा। घर में भी सम्मान होगा और बाहर भी कोई मेरी तरह यह नहीं कहेगा कि कवि तो ठीक है लेकिन काम क्या करते हो? तो क्या कविता करना और कवि-सम्मेलनों में जाना छोड़ दें? यदि कहीं नहीं जाते तो हमारी पहचान कैसे बनेगी? देखो, बात को सुनो और समझो-फ़िल्मी गीतकार अपने गीतों से कमाता है, बड़े-बड़े कवि कवि-सम्मेलन में आने के सौ नखरों के साथ पैसे लेकर कविता पढ़ते हैं और कमाते हैं, फ़िल्म कथाकार कहानी के लाखों कमाता है, फ़िल्मी कलाकार तो लिखता भी नहीं है, केवल डायलाग बोलने के लाखों कमाता है तो केवल कवियों को ही क्या शौक है कि वे अपने पैसे खर्च करके शहर-शहर जाते हैं, समय और धन लगाते हैं, जो समय अपने परिवार को देना चाहिये तालियों के चक्कर में कवि सम्मेलनों में लुटा आते हैं। बात समझ में आई?
दरअसल कवि सम्मेलन में कवियों के प्राण बसते हैं। कवि सम्मेलन से बढ़कर अभिव्यक्ति की कसौटी का मापदंड कोई नहीं है। तुरत-फुरत में कवि की प्रतिभा खुल कर सामने आ जाती है या फिर जनता जनार्दन कवि को दो-चार पंक्तियों में ही उसकी औकात दिखा देते हैं। कवि सफल है या असफल, ये उन तालियों के स्वभाव पर निर्भर करता है जो उसकी कविता के दौरान बजती हैं और कवि स्वयं समझ जाता है कि वह हिट हुआ है या हूट। कवि के हिट या हूट होने का सीधा असर कवि सम्मेलन के आयोजक व आयोजन पर भी पड़ता है। हमारे पहले लेख में हमने कवियों का दर्द बयां किया था कि उन्हें जीवन भर कविता सुनाते रहने पर भी कोई पारीश्रमिक नहीं मिलता है और वो बस कवि सम्मेलन की शोभा बढ़ाते ही रह जाते हैं। उस लेख में हमने कवि को कविता सुनाने के पारीश्रमिक का जिक्र किया था और पाठकों ने आयोजकों के विरुद्ध टिप्पणियों का तांता लगा दिया था कि आयोजक सारा पैसा खा जाता है इसलिये कवि को कुछ नहीं मिलता। हमारा प्रश्न है कि ये आयोजक आकिर है कौन और उसके पास कवि सम्मेलन आयोजित करने के लिये पैसा आता कहाँ से आता है? क्या ये आयोजक सरकार है, कोई धन्ना सेठ है, कोई कार्पोरेट बिज़नेस है, कोई धनाड्य संस्था है, कोई व्यापारी है जो कवि सम्मेलन से धन कमा रहा है? आखिर यह आयोजक है कौन?
मान्यवर महोदय, ये आयोजक हम लोगों में से ही कोई उत्साही जीव है जो आगे बढ़कर हिंदी की सेवा करना चाहता है और मानो या ना मानो, इस किस्म के आयोजक के पास उत्साह तो होता है मगर पैसा नहीं होता। यह कुछ अपनी आमदनी से, कुछ मित्रों की जेबों से, कुछ पत्नी की जमा पूंजी से, कुछ चंदे से और बाकी बचा अपने क्रेडिट कार्ड से काम चलाकर आयोजक बन जाता है क्योंकि इसे बड़े लोगों में अपना नाम शुमार करने की, कुछ बड़ा, कुछ हटकर करने और अखबार में नाम व फ़ोटो छपवाने की ललक होती है। इसके पास सब कुछ होता है पर अपना पैसा नहीं। यह खुशी से फूल मालाओं का इंतजाम करता है, बैनर बनवाता है, किराये पर मीटिंग हाल उपलब्ध करवाता है, मुख्य अतिथि व अध्यक्ष जी को लाने व छोड़ने के लिये कार उपलब्ध करवाता है, पानी, चाय, समोसे व मिठाई का इंतजाम करता है और एक पर्ची पर सब खर्चे भी लिखता जाता है। इन सबके अतिरिक्त वह माइक और फ़ोटोग्राफ़ी का इंतजाम भी करता है, कुर्सियां लगाता है और कवि सम्मेलन का उद्घोषक व संचालक बन चंद लाइनों से श्रोताओं को व स्वयं, सब को प्रसन्न भी करता है। क्या इस उधारी क्षमता वाले आयोजक से आप कवि सम्मेलन के खर्चों के साथ-साथ कवियों की फ़ीस की भी अपेक्षा रखते हैं? यदि हाँ तो मत रखिये, ये नहीं दे पायेगा, सम्मान-पत्र दे दे, वही गनीमत समझिये। पैसों की गुंजाइश रखिये लाल किले पर होने वाले कवि सम्मेलन में भाग लेने वाले कवियों के लिये, लेकिन वहाँ की सीढ़ियां चढ़ना सब के बस की बात नहीं। तभी उन्हें हजारों में मिलते हैं क्योंकि वो पैसे, नहीं पैसे नहीं, फ़ंड, सरकार से आते हैं। जो प्राइवेट-लिमिटेड कवि सम्मेलन आयोजित होते हैं वहाँ कविता सुनाने की फ़ीस का चलन नहीं है क्योंकि वह संभव ही नहीं है। पहला जमाना था जब प्रत्येक राज दरबार में एक राजकवि होता था जो राजा की अनुकंपा पर राज्य के पैसे पर जीवन यापन करता था और कविता करता था। कुछ कबीर जैसे जो किसी राजा के राजकवि नहीं बन सके, फक्कड़ रह गये। लेकिन तब ज्यादा साहित्यकार नहीं रहे होंगे तभी किसी एक कवि को राजाश्रय मिल जाता था।
अब कवियों की संख्या लाखों में है, कतिपय कुछ ज्यादा ही तो राजाश्रय की बात छोड़ दीजिये, शहर या देश के किसी धनाड्य की बात भी छोड़ दीजिये क्योंकि उन्हें कविता के लिये फ़ुर्सत ही नहीं है। ले दे कर बचती हैं संस्थाएं जो हिंदी की सेवा भी कर रही हैं और कवियों को मंच भी प्रदान कर रही हैं।
इन संस्थाओं के पास जनता के धन के नाम पर मासिक या वार्षिक सदस्यता शुल्क के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है वो भी पूरे लोग नियमित रूप से नहीं देते। तो कवियों को देने के लिये पैसा आये कहाँ से? हमारा तो यही कहना है कि सरकार कम से कम पंजीकृत संस्थाओं को उनकी सदस्य संख्या के आधार पर एक नियमित सहायता राशि उपलब्ध करवाये जिससे वे कवि सम्मेलन आयोजित कर सकें, सदस्यों को पुस्तकें प्रकाशित करवाने में सहायता उपलब्ध करवा सकें, सम्मान-पत्र और समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के आधार पर नकद ईनाम राशि उपलब्ध करवा सकें। इससे सम्मानपूर्वक हिंदी का भी प्रचार-प्रसार होगा और कवियों को भी कोई यह नहीं पूछेगा कि कवि तो ठीक है, करते क्या हो?
(लेखक विश्व हिंदी संस्थान कनाडा के संस्थापक हैं।)
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