प्रमोद भार्गव
कोरोना महामारी के दौरान अधिकांश विद्यालयों में ऑनलाइन कक्षाएं चल रही हैं, परंतु इससे 80 प्रतिशत बच्चों में सीखने की क्षमता घट गई है। सबसे ज्यादा 4 से 18 साल के बच्चे व किशोर प्रभावित हुए हैं। बच्चों में नई चीजों को सीखने की जिज्ञासा और उत्साह भी कम हुआ है। जबकि यही उम्र सीखने और सीखे हुए को स्मृति में रखने की दृष्टि से सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है।
देश के छह राज्यों में यूनीसेफ ने इन कक्षाओं पर सर्वे किया है। इस रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि पांच से 13 वर्ष आयु समूह के छात्रों के 73 फीसदी माता-पिता, 14 से 18 वर्ष के 80 फीसदी किशोरों के माता-पिता और 67 प्रतिशत शिक्षकों का कहना है कि बच्चे विद्यालय जाने की तुलना में कम सीख रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 8 प्रतिशत शिक्षकों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप नहीं हैं और 33 प्रतिशत शिक्षकों का कहना है कि इन आभासी कक्षाओं से विद्यार्थियों को कोई फायदा नहीं है। इन कक्षाओं में 30 से 40 फीसदी शहरी छात्र शिक्षकों के संपर्क में ही नहीं आए। ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और बदतर रही, यहां 50 से 60 प्रतिशत विद्यार्थी शिक्षकों के संपर्क में नहीं आए। साफ है, ऑनलाइन शिक्षा का ढिंढोरा चाहे जितना पीट लें, बुनियादी शिक्षा आखिरकार अधूरी ही रही है।
ऑनलाइन यानी, डिजिटल शिक्षा का हश्र सिर मुढ़ाते ओले पड़ने की शक्ल में दिखाई देने लगा है। लॉकडाउन के बीच शुरू हुआ ऑनलाइन पढ़ाई का चलन स्कूली बच्चों पर भारी पड़ रहा है। नतीजतन उन्हें कई-कई घंटे कंप्युटर, लैपटॉप और मोबाइल उपकरणों पर आंखें गड़ानी पड़ रही है और दिमाग पर जोर डालना पड़ रहा है। इससे विद्यार्थी अनावश्यक रूप से एकांगी और चिंतित दिखाई देने लगे हैं। अपने बच्चों में अचानक आए इन लक्षणों की बड़ी संख्या में शिकायत अभिभावकों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय और केंद्रीय विद्यालय संगठन को भी की हैं। बिना विचार किए डिजिटल माध्यम से विवश किए बच्चों को इस मानसिक तनाव से उबारने के लिए अब मंत्रालय ने इस परिप्रेक्ष्य में मानक क्रियाशील प्रक्रिया (स्टेंडर्ड ऑपरेटिव प्रोसीजर) अपनाने का निर्णय लिया है। संक्षिप्त में एसओपी नाम से जाने, जाने वाले इस मंत्र का इस्तेमाल कंपनियों में विफलता को कम करते हुए दक्षता, गुणवत्ता, प्रदर्शन और उत्पादन में वृद्धि व एकरूपता लाने के लिए किया जाता है। अब पहली बात तो यह कि बच्चों का मस्तिष्क कोई कारखाने की भट्टी नहीं है कि आप संख्या में वस्तु का उत्पादन बढ़ाने का काम कर रहे हो ? जबकि विवेकानंद ने शिक्षा को जीवन के विकास का मंत्र बताते हुए कहा था कि मात्र सूचना प्राप्त करना, पुस्तकों से सीखना या इच्छाओं पर बलपूर्वक रोक लगाकर यांत्रिक बना देना शिक्षा नहीं है। शिक्षा वह है, जो मनुष्य को साहसी और चरित्रवान बनाती है।
दरअसल ऑफलाइन शिक्षा पद्धति में विद्यार्थी की बुद्धि की परख का परीक्षा का जो तरीका इसमें है, वही इस के-12 शिक्षा प्रणाली में है। महज पुस्तकों के पाठ्यक्रमों को डिजिटल प्रारूप में बदल दिया है। इसलिए यह प्रणाली भी विद्यार्थी के मनोविज्ञान व मनस्थिति को समझने में सक्षम नहीं है। दरअसल, प्रत्येक विद्यार्थी की बौद्धिक क्षमता और रुचियां भिन्न-भिन्न होती हैं, इसलिए पढ़ाई का एक पाठ्यक्रम और एक जैसा तरीका हरेक पात्र पर कारगर साबित नहीं होता।
शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन द्वार खोलने की बड़ी तैयारी है। लेकिन न तो इसकी विषमताओं को समझने की कोशिश हो रही है और न ही यह कोशिश हो रही है कि इस माध्यम से स्थापित कर दी गईं संकीर्ण शिक्षा की दीवारें टूटना संभव है ? गोया, कृत्रिम तरीके से दी गई शिक्षा, नैसार्गिक या जिज्ञासु प्रतिभा का स्थान ले पाएगी ? या फिर नैसार्गिक शिक्षा को कुंठित करने का काम करेगी ? दरअसल किसी उपकरण में भर दिए गए ज्ञान की एक सीमा होती है और वह तय कर दिए गए प्रोग्रामिंग के अनुसार चलती है। उसमें कोई लचीलापन नहीं होता। जबकि विद्याार्थी की बुद्धि के विकास का क्रम कोई एक सीधी रेखा में नहीं चलता। ज्ञान नदी की धारा की तरह प्रवाहमान है। उसमें नए-नए रूप लेते हुए, जीवन-मूल्यों को देखते हुए, वैचारिक बदलाव आता है। नई सोच विकसित होती है। यह बदलाव प्रतिभा के नैसार्गिक विकास का मूल आधार है, क्योंकि किसी उपकरण में सोच या विचार पनपाने की उर्वरा शक्ति नहीं होती है।
उपरोक्त कथन के सत्यापन के लिए दुनिया के अत्यंत सफल और आविष्कारक व्यक्ति बिल गेट्स की जीवनी पर दृष्टि डालते हैं। हम सब जानते हैं कि आज बिल गेट्स दुनिया के अमीर लोगों में से एक हैं। बिल गेट्स ने उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में प्रवेश तो लिया था, लेकिन शिक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। वे कॉलेज से आकर अपने घर के गैरेज में घुस जाते थे और कोरे कागजों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर किसी दार्शनिक के लहजे में धीर-गंभीर वैचारिक तल्लीनता में खो जाते थे। उनकी परेशान मां कभी स्कूल के कपड़े बदलने को आवाज लगातीं, तो कभी भोजन के लिए पुकारतीं। लेकिन धुनि बिल अपनी ही धुन में रमा रहता। अंत में गैरेज की दहलीज पर आकर डपटते हुए पूछतीं, ‘आखिर तू कर क्या रहा है ?’ बिल कहता, सोच रहा हूं मां।’ वात्सल्मयी मां सहम गईं। अनुभव किया, बेटा अवसाद में आ रहा है, कहीं पगला न जाए ? सो, मनोचिकित्सक को दिखाया। लेकिन अस्वस्थ होता, तब न कोई बीमारी निकलती ?
बहरहाल, मां हार गई और बेटा आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने में लगा रहा। इस गैरेज में कंप्युटर नहीं था लेकिन जिज्ञासा थी, सोच थी। आखिरकार बिल की सोच ने आकार लिया और कंप्युटर की बुद्धि अर्थात सॉफ्टवेयर का आविष्कार कर डाला। मसलन वास्तविक बुद्धि ने कृत्रिम बुद्धि की सजीव रचना कर दी। लेकिन हम हैं कि ऑनलाइन शिक्षा के बहाने नैसर्गिक बुद्धि पर अंकुश लगाने के उपाय तलाश रहे हैं ? डिजिटल शिक्षा से जुड़ा यह एक बड़ा प्रश्न है, जो विचारनीय है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
