Saturday, April 11, 2026
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सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमनन) विधेयक 2020 लोकसभा में होगा पेश

नई दिल्ली (हि.स.)। मंगलवार को लोकसभा में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमनन) विधेयक 2020 पेश करने जा रहे हैं। संसद के दोनों सदनों में पारित हो जाने एवं इस विधेयक के कानून का रूप लेने के बाद केंद्र सरकार इस अधिनियम पर अमल की तिथि को अधिसूचित करेगी। इसके बाद राष्ट्रीय बोर्ड का गठन किया जाएगा।

विधेयक के क्या होंगे फायदे

विधेयक में केंद्रीय डेटाबेस के रखरखाव तथा राष्ट्रीय बोर्ड के कामकाज में उसकी सहायता के लिए राष्ट्रीय रजिस्ट्री एवं पंजीकरण प्राधिकरण का भी प्रावधान किया गया है। विधेयक में उन लोगों के लिए कठोर दंड का भी प्रस्ताव किया गया है, जो लिंग जांच, मानव भ्रूण अथवा जनन कोष की बिक्री का काम करते हैं और इस तरह के गैर-कानूनी कार्यों के लिए एजेंसियां एवं संगठन चलाते हैं।

इस कानून का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि यह देश में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी सेवाओं का नियमन करेगा। अत: यह कानून बांझ दम्पत्तियों में सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) के तहत नैतिक तौर-तरीकों को अपनाए जाने के संबंध में कहीं अधिक भरोसा पैदा करेगा।

उद्देश्य

सहायक प्रजनन तकनीक सेवाओं के नियमन का मुख्य उद्देश्य संबंधित महिलाओं एवं बच्चों को शोषण से संरक्षण प्रदान करना है। डिम्बाणुजन कोशिका दाता को बीमा कवर मुहैया कराने एवं कई भ्रूण आरोपण से संरक्षण प्रदान करने की जरूरत है और इसके साथ ही सहायक प्रजनन तकनीक से जन्म लेने वाले बच्चों को किसी जैविक बच्चे की भांति ही समान अधिकार देने की आवश्यकता है। एआरटी बैंकों द्वारा किये जाने वाले शुक्राणु, डिम्बाणुजन कोशिका और भ्रूण के निम्नताप परिरक्षण का नियमन करने की जरूरत है। इस विधेयक का उद्देश्य सहायक प्रजनन तकनीक के जरिए जन्म लेने वाले बच्चे के हित में आनुवांशिक पूर्व आरोपण परीक्षण को अनिवार्य बनाना है।

पृष्ठभूमि

देश में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी सेवाओं में सुरक्षित एवं नैतिक तौर-तरीकों को अपनाने के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। इस विधेयक के जरिए राष्ट्रीय बोर्ड, राज्य बोर्ड, नेशनल रजिस्ट्री और राज्य पंजीकरण प्राधिकरण सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी से जुड़े क्लिनिकों और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी बैंकों का नियमन एवं निगरानी करेंगे।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। एआरटी केन्द्रों और हर साल होने वाले एआरटी चक्रों की संख्या में सर्वाधिक वृद्धि दर्ज करने वाले देशों में भारत भी शामिल है। वैसे तो इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) सहित सहायक प्रजनन तकनीक ने बांझपन के शिकार तमाम लोगों में नई उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन इससे जुड़े कई कानूनी, नैतिक और सामाजिक मुद्दे भी सामने आए हैं। इस वैश्विक प्रजनन उद्योग के प्रमुख केंद्रों में अब भारत भी शामिल हो गया है। यही नहीं, प्रजनन चिकित्सा पर्यटन का भी चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। भारत में इससे संबंधित क्लिनिक अब जननकोश दान करना, अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान (आईयूआई), आईवीएफ, आईसीएसआई, पीजीडी और गर्भकालीन सरोगेसी जैसी लगभग सभी तरह की एआरटी सेवाएं मुहैया करा रहे हैं। हालांकि, भारत में इस तरह की अनेक सेवाएं मुहैया कराने के बावजूद संबंधित प्रोटोकॉल का अब तक कोई मानकीकरण नहीं हो पाया है और इस बारे में सूचनाएं देने का चलन अब भी काफी हद तक अपर्याप्त है।

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