Tuesday, February 17, 2026
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सनातन धर्म के मूल्यों के प्रति सदैव समर्पित रहा है गोरक्षपीठ का कार्य : आदित्यनाथ

गोरखपुर (हि.स.)। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ महाराज और ब्रह्मलीन अवेद्यनाथ महाराज की पुण्यतिथि पर गोरखनाथ मंदिर में आयोजित साप्ताहिक समारोह में मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पिछले एक सप्ताह से चल रहे इस समारोह के विभिन्न सत्रों में देश और समाज से जुड़ी ज्वलंत समस्याओं पर मंथन हुआ। यहां पर ज्ञान यज्ञ के रूप में श्रीराम कथा श्रवण का आनंद भी प्राप्त हो रहा है।

आदित्यनाथ ने कहा कि गोरक्षपीठ का कार्य सनातन धर्म के मूल्यों के प्रति सदैव समर्पित रहा है। उन्होंने कहा कि जिन समसामयिक विषयों को लेकर महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने अपना पूरा जीवन दिया था, उनका अनुसरण कर देश, समाज और लोक-कल्याण के उन प्रकल्प को हम आगे बढ़ा रहे हैं। गोरक्षपीठ की यह परंपरा बहुत अद्भुत है। पितृपक्ष की तृतीया तिथि को महंत दिग्विजयनाथ महाराज ब्रह्मलीन हुए और चतुर्थी तिथि को महंत अवैद्यनाथ महाराज ने इस लोक की लीला का समारोप किया। इनका श्राद्ध कर्म के साथ-साथ पुण्यतिथि का आयोजन एक साथ स्वतः ही जुड़ता है।

उन्होंने कहा कि महंत दिग्विजयनाथ ने धर्म, समाज और राष्ट्र के लिए अपन सर्वस्व दिया है। य़ह वे अच्छी तरह जानते थे कि कोई भी समाज तब तक शक्तिशाली अथवा सामर्थ्यवान नहीं हो सकता, जब तक उत्तम शिक्षा ना हो; कोई समाज तब तक स्वस्थ नहीं हो सकता, जब तक आरोग्यता प्राप्त करने के लिए उस प्रकार के अवसर उनके सामने ना हों। गोरक्षपीठ की परंपरा सनातन धर्म के मूल्यों और आदर्शों के प्रति सदैव समर्पित होकर साथ कार्य करती रही है। लोक कल्याण के कार्यों से निरंतर जुड़ी रही है। आदित्यनाथ ने कहा कि जड़ और चेतन के बेहतर समन्वय से जीवन चक्र चलता है। जीवन चक्र को चलाने के लिए वनस्पतियां हैं, जीव-जंतु हैं। इनके महत्व को भी सनातन धर्म ने स्वीकारा है।

आदित्यनाथ ने कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता समर के समय गोरक्षपीठ में महंत गोपालनाथ जी गोरक्ष पीठाधीश्वर थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया था। क्योंकि वे क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे थे। इन पर आरोप था कि यह क्रांतिकारियों को प्रश्रय देते हैं। उससे पहले भी हमारे पूज्य संतों की परंपरा ने पूरे देश के अंदर सनातन धर्म की रक्षा के लिए अनेक अखाड़ों की परंपरा का प्रतिनिधित्व किया। योगी ने कहा कि जब राष्ट्र और धर्म के सामने कोई समस्या पैदा होती थी, तब यही लोग शस्त्र और शास्त्र दोनों का संधान करते थे। यही भारत की परंपरा है।

आमोद

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