Tuesday, January 13, 2026
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श्वासानां शरीराणां वाचानां महीपतिः की आवश्यकता

रघोत्तम शुक्ल

2014 में नरेंद्र मोदी के सत्तारूढ़ होने के बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में एक अलिखित नियम प्रचलित किया था कि कोई नेता 75 वर्ष का हो जाने पर मुख्य धारा के सक्रिय पदों पर कार्यरत रहने योग्य नहीं माना जायगा; अलबत्ता वह गवर्नर जैसे किनारे के पदों पर भेजा जा सकता है। इसके अनुपालन में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांताकुमार, सुमित्रा महाजन, कलराज मिश्र, हृदयनारायण दीक्षित आदि न जाने कितने नेता साइड लाइन किये गये।

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अब स्वयं प्रधानमंत्री भी उम्र के उसी पड़ाव पर हैं। उनके बारे में इसका कार्यान्वयन होने का कोई लक्षण परिलक्षित नहीं होता। यह जरूर है कि वे सर्वोच्च शासक या राजा के पद पर हैं और उनसे कोई इसका पालन करने हेतु कह नहीं सकता। वैसे नियम सबके लिये समान रूप से मान्य होते हैं। राजाओं के लिये तो वचन बहुत मायने रखते हैं। कहा गया है, ‘श्वासानां शरीराणां वाचानां महीपतिः’ यानी जैसे शरीर के लिये श्वास वैसे ही राजा के लिये वचन।

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रही बात नियम के लिखित न होने की तो ब्रिटेन का तो पूरा संविधान ही अलिखित है और अपने देश में भी शादी- ब्याह से लेकर त्योहार और पर्व प्रायः परम्परा पर ही आधारित हैं। भगवान शंकर ने भस्मासुर को वरदान दिया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख देगा, वह भस्म हो जायगा। उसने शंकर जी को ही भस्म करने की कोशिश की। भगवान शंकर चाहते तो उसका वरदान या उसे ही नष्ट कर देते; किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपना वरदान कायम रखा और बचने के लिये भागे। अंततः विष्णु जी ने इसका तोड़ निकाला और मोहिनी रूप धारण कर असुर को नष्ट किया। अतः नियम सबके लिये समान होना चाहिये।

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