-प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी पर न्यायालय ने लगाया 500 रुपये का जुर्माना
वाराणसी (हि.स.)। ज्ञानवापी शृंगार गौरी प्रकरण में गुरुवार को जिला जज डाॅ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में सुनवाई हुई। प्रतिवादी पक्ष ने अदालत में जवाबी बहस (रिज्वाइंडर ) के लिए और समय मांगा। प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि उनके मुख्य अधिवक्ता अभयनाथ यादव के निधन होने के बाद उनके स्थान पर अधिवक्ता योगेंद्र प्रसाद सिंह, और शमीम अहमद मुकदमें की पैरवी और जवाबी बहस करेंगे। इसलिए जवाबी बहस की तैयारी के लिए 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाए।
अदालत ने प्रतिवादी पक्ष पर मामले में देरी की वजह से पांच सौ रुपये का जुर्माना लगाने के बाद 22 अगस्त को अगली सुनवाई की तिथि तय की। इसके पहले प्रतिवादी पक्ष के मुख्य अधिवक्ता अभय नाथ यादव के निधन के बाद अदालत ने एक पखवाड़े का समय देकर 18 अगस्त की तिथि नियत की थी। मुकदमे में प्रतिवादी पक्ष ने अदालत में दलील पेश की थी कि यह केस सुनवाई योग्य नहीं है। वहीं, वादी पक्ष की 5 महिलाओं की ओर से उनके अधिवक्ताओं ने कोर्ट में दलील पेश की थी कि मुकदमा हर हाल में सुनवाई योग्य है। वादी पक्ष के अधिवक्ताओं के दलीलों पर अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी की ओर से जवाबी बहस की जानी है।
वादी संख्या दो से पांच और वादी संख्या एक राखी सिंह के अधिवक्ताओं ने अपने दलीलों में कहा था कि देश की आजादी के दिन से लेकर वर्ष 1993 तक मां शृंगार गौरी की नियमित पूजा होती थी। साल 1993 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने अचानक बैरिकेडिंग लगाकर दर्शन और पूजा बंद करा दिया। मुकदमे में दावा ज्ञानवापी की जमीन पर नहीं है। दावा सिर्फ मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन और पूजन के लिए है। देवता की संपत्ति नष्ट नहीं होती है। मंदिर टूट जाने से उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। वर्ष 1937 के दीन मोहम्मद केस का फैसला आया था। वह सभी पर बाध्यकारी नहीं है क्योंकि उसमें हिंदू पक्षकार कोई नहीं था। हिंदू लॉ में अप्रत्यक्ष देवता भी मान्य हैं। देवता को हटा दिए जाने से भी उनका स्थान वहीं रहता है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि मुस्लिम लॉ में स्पष्ट है कि जो प्रॉपर्टी वक्फ को दी जाती है वह मालिक द्वारा ही दी जा सकती है। ज्ञानवापी के संबंध में कोई वक्फ डीड नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने उपेंद्र सिंह के मुकदमे में स्पष्ट किया है कि धार्मिक अधिकार सिविल वाद के दायरे में आते हैं। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट में आराजी नंबर.9130 देवता की जगह मानी गई है। सिविल प्रक्रिया संहिता में संपत्ति का मालिकाना हक खसरा या चौहद्दी से होता है।
श्रीधर
