Wednesday, April 1, 2026
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विशेषज्ञों ने विस्तार से बताया लैंगिक अपराधों में क्या करें, क्या न करें

पुलिस लाइन सभागार में आयोजित हुई पाक्सो एक्ट से सम्बंधित मामलों की कार्यशाला

जानकी शरण द्विवेदी

गोंडा। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के निर्देशन में पूरे प्रदेश में चलाए जा रहे मिशन शक्ति अभियान के तहत रविवार को पुलिस लाइन के सभागार में पुलिस अधिकारियों, विधि विशेषज्ञों तथा थानों पर तैनात बाल कल्याण अधिकारी व महिला कर्मचारियों का जमावड़ा रहा। करीब चार घंटे तक चले मैराथन सेमिनार में पुलिस अधिकारियों व विशेषज्ञों ने बाल कल्याण अधिकारियों व महिला पुलिस अधिकारियों के साथ इस बात पर गहन चर्चा किया कि लैंगिक अपराधों के मामले में हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। विवेचक किन बातों का ध्यान रखकर पीड़ितों को न्याय तथा अपराधियों को सजा दिलाने में कामयाब हो सकते हैं।

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नाबालिग के गायब होने पर FIR लिखी जाएगी, गुमशुदगी नहीं

सेमिनार में लैंगिक अपराधों से सम्बंधित भादवि की धाराओं तथा पास्को एक्ट में अपराधों के पंजीकरण एवं विवेचना पर चर्चा करते हुए अपर पुलिस अधीक्षक शिवराज ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे के गायब होने की सूचना मिलते ही थाने पर भादवि की धारा 363 के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाएगी, गुमशुदगी नहीं। ऐसा न करने पर हेल्प डेस्क पर बैठी महिला पुलिस अधिकारी, ड्यूटी पर मौजूद लेखक, दिवस अथवा रात्रि अधिकारी और थाना प्रभारी सीधे-सीधे जिम्मेदार होंगे। इसी प्रकार थाने पर किसी के साथ लैंगिक अपराध होने की सूचना मिलते ही सर्वप्रथम थाने का बाल कल्याण अधिकारी उसकी बात महिला पुलिस अधिकारी से कराएगा। महिला पुलिस अधिकारी, थाने पर मौजूद निरीक्षक, उपनिरीक्षक, मुख्य आरक्षी अथवा आरक्षी आदि में से कोई भी हो सकता है। अपराध की पुष्टि होते ही तत्काल अभियोग दर्ज किया जाएगा तथा महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दंप्रसं की धारा 161 के तहत पीड़ित का बयान दर्ज किया जाएगा। इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि बयान वाले कागज पर उसे दर्ज करने वाले महिला पुलिस अधिकारी का हस्ताक्षर होना है, न कि पीड़ित का। पीड़ित का बयान दर्ज होते समय पीड़ित का वीडियो भी रिकार्ड किया जाएगा, जिसमें पीड़ित और बयान लेने वाला पुलिस अधिकारी दिखना चाहिए। यह बयान पेन ड्राइव में सुरक्षित होगा। इसे केस डायरी का भाग भी बनाया जा सकता है।

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पीड़ित को 24 घंटे में सीडब्लूसी के समक्ष पेश करना जरूरी

पुलिस अभिरक्षा में आने के बाद पीड़ित को 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति (सीडब्लूसी) के समक्ष पेश करना होगा। इससे पूर्व थाने पर अपराध दर्ज होते ही उसकी एक प्रति सम्बंधित क्षेत्राधिकारी कार्यालय और एक प्रति सीडब्लूसी को अनिवार्य रूप से भेजी जाएगी। किसी अग्रिम विधिक कार्रवाई की जरूरत होने पर पीड़ित को वन स्टाप सेंटर पर रखा जाएगा। कोई भी पुलिस अधिकारी, चाहे वह महिला ही क्यों न हो, उसे अपने आवास अथवा थाने पर रात्रि में नहीं रखेगा। यदि प्राथमिकी, दंप्रसं की धारा 161 और 164 के बयान में भिन्नता है तो सभी को एक साथ रखकर विचारण करते हुए तथा पीड़ित के अन्य निकट सम्बंधियों का बयान दर्ज करते हुए विवेचक तय करेगा कि अपराध किस कोटि का है। ऐसे मामलों में यदि घटना सत्य है तो 60 दिन के अंदर आरोप पत्र लगाना अनिवार्य है।

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सेफ किट में सुरक्षित किया जाएगा वेजाइनल स्वैब

एएसपी ने बताया कि ऐसे अपराधों में सेक्सुअल एसाल्ट फारेंसिक एवीडेंस (सेफ) किट के माध्यम से पीड़िता का वेजाइनल स्वैब संरक्षित किया जाता है। इसके लिए थाने पर घटना की जानकारी मिलते ही तत्काल फील्ड यूनिट को सूचित किया जाना चाहिए। अपरिहार्य स्थितियों में थाने पर तैनात महिला आरक्षियों के माध्यम से भी यह कार्य किया जा रहा है। सभी थानों पर पर्याप्त संख्या में यह किट उपलब्ध है। इस प्रकार उसके शरीर या कपड़ों पर मिले रक्त के धब्बे, वीर्य और नाखून में मिले बाल, त्वचा आदि भी पूरी तरीके से पैक किया जाना चाहिए।

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निजता सार्वजनिक किया तो इन धाराओं में होगी FIR

उन्होंने बताया कि पास्को एक्ट की धारा 27 में चिकित्सीय परीक्षण की बात कही गई है। इस मौके पर नाबालिग पीड़ित के माता-पिता अथवा अभिभावक रह सकते हैं, किन्तु आरोपी पक्ष के किसी भी व्यक्ति का उसके इर्द-गिर्द भी नहीं फटकने पाना चाहिए। चिकित्सीय परीक्षण के दौरान पीड़ित की निजता का पूरा ध्यान रखना है। यह सम्पूर्ण कार्रवाई पूरी गोपनीयता के साथ सम्पादित की जाएगी। उन्होंने कहा कि चिकित्सीय परीक्षण के समय अक्सर कई लोग पीड़ित के इर्द-गिर्द घूमकर उससे बातचीत करने, फोटो खींचने अथवा वीडियो बनाने की फिराक में होते हैं। कानून ने इसे पूरी तरह से निषिद्ध कर रखा है। यदि कोई भी व्यक्ति ऐसा करने की कोशिश करता है तो आन ड्यूटी पुलिस अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह उसे ऐसा करने से दृढ़ता से रोके। मना करने के बावजूद न मानने पर उसके खिलाफ भादवि की धारा 228ए, पाक्सो एक्ट की धारा 23 तथा जुबनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट की धारा 74 के तहत प्राथमिकी दर्ज हो सकती है।

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आयु निर्धारण में आधार कार्ड विधि मान्य नहीं

पीड़िताओं के चिकित्सीय परीक्षण, आयु निर्धारण, सुपुर्दगी, देखरेख एवं संरक्षण विषय पर बोलते हुए क्षेत्राधिकारी सदर लक्ष्मी कांत गौतम ने कहा कि ऐसे मामलों में ‘एएए’ श्रेणी का चिकित्सीय परीक्षण महिला पुलिस अधिकारी के पर्यवेक्षण में होगा। अधिकांश विवेचक पीड़ित अथवा आरोपी के आयु निर्धारण में आधार कार्ड तथा परिवार रजिस्टर की नकल लगाते हैं, जो विधि मान्य नहीं है। उन्होंने बताया कि हाईस्कूल की परीक्षा के प्रमाण पत्र में अंकित जन्म तिथि सर्वमान्य है। इसके न रहने पर कक्षा आठ या पांच जो भी हो, यदि उसने किसी स्कूल में कभी दाखिला लिया था, तो पंजीकरण रजिस्टर से उसकी जन्म तिथि प्राप्त की जा सकती है। साथ ही सम्बंधित विद्यालय के प्रधान अध्यापक से इस आशय का एक प्रमाण पत्र भी लिया जाना श्रेयस्कर होगा कि विद्यालय के अभिलेखों के अनुसार अमुक की जन्म तिथि यह है। विद्यालय के अभिलेखों में कोई छेड़छाड़ नहीं किया गया है। ऐसा करने से जल्दी कोई भी गलत प्रमाण पत्र जारी करने की हिम्मत नहीं जुटाएगा। यह भी न मिल पाने पर नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम अथवा जिला पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र विधि मान्य होता है।

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आयु निर्धारण का अंतिम विकल्प है चिकित्सीय परीक्षण

चिकित्सीय परीक्षण अंतिम विकल्प होना चाहिए क्योंकि इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में कोई निश्चित तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती है। ऐसी दशा में बालिग आरोपी को नाबालिग और नाबालिग पीड़िता को बालिग साबित किए जाने की संभावना रहती है। बचाव पक्ष अदालत में इस विन्दु पर ज्यादा फोकस करता है। इसलिए यदि हमारे पास शैक्षिक प्रमाण पत्र उपलब्ध हैं तो चिकित्सीय परीक्षण कराते समय सम्बंधित डाक्टर को स्पष्ट मना कर देना है कि उन्हें आयु निर्धारण के सम्बंध में कोई जांच नहीं करनी है। चिकित्सीय परीक्षण में एक उल्लेखनीय जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं की सहमति आवश्यक है किन्तु नाबालिग होने की दशा में उसकी सहमति कोई मायने नहीं रखती अर्थात् उसके चिकित्सीय परीक्षण अथवा 161 का बयान दर्ज कराए जाने से मना करने के बावजूद उसका चिकित्सीय परीक्षण कराया जाएगा और काउंसलिंग करके बयान भी दर्ज कराया जाएगा।

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दुष्कर्म से गर्भवती होने पर DNA टेस्ट जरूरी

उन्होंने कहा कि यदि दुष्कर्म के कारण कोई किशोरी गर्भवती हो जाती है, उसका डीएनए टेस्ट कराया जाना जरूरी होता है। इससे हम आरोपी को वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर दोषी साबित कर पाते हैं तथा कई बार वादी मुकदमा व गवाहों के पक्ष द्रोही होने के बावजूद अदालतें आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा दे देती हैं। कार्यशाला के समापन पर एसपी ने सभी उपस्थित पुलिस कर्मचारियों से एक-एक प्रश्न कर उनका परीक्षण किया तथा भविष्य में इस प्रकार के और भी कार्यशालाएं आयोजित किए जाने का आश्वासन दिया। कार्यशाला को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष प्रेम शंकर श्रीवास्तव, विशेष लोक अभियोजक (पाक्सो एक्ट) अशोक कुमार सिंह व सुनील कुमार मिश्र, राम कृपाल शुक्ला, सहायक अभियोजन अधिकारी अम्बरीश वर्मा आदि उपस्थित रहे।

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जानकी शरण द्विवेदी
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