वाराणसी (हि.स.)। लगभग आठ किलोमीटर के दायरे में फैले गंगा के अर्धचंद्राकार पथरीले 84 घाटों में एक घाट भगवान गणपति को भी समर्पित है। गणेश घाट नाम से प्रसिद्ध इस घाट की शिव-पार्वती और हिमालय के साथ शिव परिवार की भी मान्यता है।
गणेश चतुर्थी तिथि पर गणेश घाट पर मां गंगा की आरती कर सामाजिक संस्था नमामि गंगे के संयोजक राजेश शुक्ला ने बताया कि गंगा की अनंत और अनगिन कथाओं के पात्रों की जीवंतता इसके घाटों पर भी नजर आती है। वाराणसी इस मामले में काफी अनोखा है। क्योंकि यहां चौरासी प्रमुख घाटों के क्रम में कई प्रमुख पात्रों को सम्मान ही नहीं विशिष्ट पहचान भी दी गई है।
गणेश घाट की महत्ता और इतिहास के सम्बंध में मान्यता है कि अठ्ठारहवीं सदी के पूवार्द्ध में पूणे के अमृतराव पेशवा ने तब कच्चे और अग्निश्वर और रामघाट के एक हिस्से का पक्का निर्माण कराया और इसे नई पहचान दी। उनके द्वारा ही यहां अमृत विनायक मंदिर सहित कई अन्य वैभवशाली निर्माण कराए गए। घाट पर ही गणेश जी का प्राचीन मंदिर स्थापित होने की वजह से ही कालांतर में घाट का नाम गणेश घाट ही पड़ गया।
शुक्ल बताते हैं कि, घाट पर गंगा दशहरा, भाद्र माह शुक्ल चतुर्थी और कार्तिक पूर्णिमा के साथ गणेश चतुर्थी आदि को स्नान करने पर विशेष पुण्य की मान्यता रही है। इन मौकों पर स्नान ध्यान के बाद गणेश मंदिर में दर्शन पूजन की विशेष मान्यता है। देवों में प्रथम होने की वजह से गणेश घाट की मान्यता विशेष तौर पर है। साथ ही गंगा और भगवान गणेश से जुडे़ सभी प्रमुख आयोजन घाट और मंदिर पर किए जाते हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र के लोगों की आस्था भी इस घाट और मंदिर के प्रति काफी है।
