Sunday, March 15, 2026
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वर्षाकाल में पशुओं को संक्रामक रोग से बचाने के लिए करें विशेष देखभाल : डा. रामजी गुप्ता

किसी भी उम्र के पशु को हो सकता है विषाणुजनित रोग खुरपका एवं मुंहपका

कानपुर (हि.स.)। वर्षाकाल के मौसम में पशुओं में कई प्रकार के संक्रामक रोग फैलते हैं, जो पशुओं को दयनीय अवस्था में पहुंचा देते हैं। पशु चारा खाना बंद कर देता है। दुधारु पशुओं का दूध बहुत कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में अगर ध्यान न दिया गया तो पीड़ित पशु की मौत भी सकती है। इसलिए पशुपालकों को इस मौसम में पशुओं की विशेष देखभाल करना चाहिए। अगर पशुपालक ऐसे समय पर पशुओं पर थोड़ा सा भी ध्यान दे तो पशु को विभिन्न संक्रामक रोगों से बचाया जा सकता है। यह बातें रविवार को सीएसए के वैज्ञानिक डा. रामजी गुप्ता ने कही।

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के कुलपति डॉक्टर डीआर सिंह के निर्देश पर पशुपालन एवं दुग्ध विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ रामजी गुप्ता ने बताया कि संक्रामक बीमारियां एक दूसरे के सम्पर्क में आने से बीमार पशु का दूषित जल एवं भोजन ग्रहण करने से फैलता है। विषाणुजनित रोग खुरपका एवं मुंहपका पशुओं को एक बहुत ही छोटे आंख से न दिख पाने वाले कीड़े द्वारा होता है, जिसे विषाणु या वायरस कहते हैं। मुंहपका-खुरपका रोग किसी भी उम्र की गायें एवं उनके बच्चों में हो सकता है। इस रोग का कोई इलाज नहीं है इसलिए रोग होने से पहले ही उसके टीके लगवा लेना फायदेमन्द है। इस रोग से पशु को तेज बुखार आता है। पैरों तथा मुंह में फफोले पड़ जाते हैं, प्रभावित होने वाले पैर को पटकना पैरो में सूजन (खुर के आस-पास) जिससे पशु लंगड़ाकर चलता है। खुर में घाव होना एवं घावों में कीड़ा हो जाना कभी-कभी खुर का पैर से अलग हो जाना।

उन्होंने कहा कि रोग के लक्षण दिखने पर रोगी पशु को तुरन्त अलग बाडे में कर दें एवं पशु के चारागाह को बदल दें। इसका टीकाकरण अवश्य करा लें। इस रोग की रोकथाम के लिए रोगग्रस्त पशु के पैर को नीम एवं पीपल के छाले का काढ़ा बना कर दिन में दो से तीन बार धोना चाहिए। छालो को लाल दवा अथवा बोरिक एसिड के घोल से दो-तीन बार धोकर मक्खी को दूर रखने वाली एंटीसेप्टिक क्रीम लगाये।

इस तरह गलाघोटू की करें पहचान

डा. गुप्ता ने बताया कि गलाघोटू रोग में पशु को तेज बुखार आता है गले तथा जीभ में सूजन बढ़ जाती है, जिसके कारण पशुओ को श्वांस लेने मे तकलीफ होने लगती है और उसके गले से घर्र-धर्र की आवाज निकलनी शुरू हो जाती है। ऐसी अवस्था में पशु चारा तथा पानी नहीं पी पाता है, यहां तक की उसे लार घुटकना मुश्किल हो जाता है, परिणाम स्वरूप पशु के मुंह से लार टपकती रहती है। पशु के गले में सूजन के स्थान पर छूने से गर्म का एहसास होता है। पशु की आंखें लाल तथा बाहर की ओर निकली प्रतीत होती है। पशु बेचैन रहता है। इस रोग की अवधि 1-3 दिन तक होती है। ऐसी अवस्था में अगर उपचार न किया गया और लापरवाही बरती गयी तो पशु की मौत भी हो सकती है।

ऐसे करें बचाव

बताया कि यह एक संक्रामक तथा छुआ-छूत वाला रोग है, इसलिए बीमार पशु का चारा किसी अन्य पशु को न खिलायें, जिस पात्र में बीमार पशु को पानी पिलाया है, उससे स्वस्थ पशु को पानी पिलाने से बचें। रोगग्रस्त पशु को जानवरों के समूह से अलग कर दें तो बेहतर नहीं तो अन्य पशुओं में ये रोग फैलने का भय बना रहता है। स्वस्थ पशओं को भी गलाधोटू का एन्टीसीरम लगाकर उन्हें बीमार होने से बचाया जा सकता है।

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