-लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन कर संतान प्राप्ति की गुहार लगाई, दो किमी तक स्नान के लिए लगी लम्बी लाइन
-28 साल बाद संतान सप्तमी व लोलार्क षष्ठी का महासंयोग
वाराणसी (हि.स.)। काशीपुराधिपति की नगरी में लोलार्क छठ पर्व पर शुक्रवार को लाखों निसंतान दम्पतियों ने कड़ी सुरक्षा के बीच संतान सप्तमी व लोलार्क षष्ठी के महासंयोग में एक साथ भदैनी स्थित प्राचीन संकरे लोलार्क कुण्ड में आस्था की डुबकी लगाई। कुंड में डुबकी लगाने के बाद आस्थावानों ने अपने गीले वस्त्र और आभूषण कुंड में ही परम्परानुसार छोड़ दिए। इसके बाद नुकीली सुईयों से बिंधे हुए फल भगवान सूर्य को चढ़ा सन्तान प्राप्ति के लिए उनसे गुहार लगाई।
महापर्व के पूर्व संध्या पर गुरूवार शाम से ही कुण्ड में स्नान के लिए हजारों दम्पति लगभग दो किलोमीटर से भी अधिक लम्बी लाइन में कतारबद्ध होकर स्नान के लिए अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे। उमस और गर्मी के बीच आस्था इस कदर हिलोरे मार रहीं थी कि कतार सोनारपुरा तक लग गई। श्रद्धालुओं ने अस्सी से लोलार्क कुंड और शिवाला से भदैनी तक की गयी बेरिकेडिंग में चादरें बिछा कर अपनी-अपनी जगह छेक ली। इस दौरान फल, फूल, पूजन सामग्री, भतुआ, श्रीफल, कदंब के फल साथ ही बनावटी पायल, बिछियां, नाक की कील और नथुनी जैसे जेवरों की सजी अस्थायी दुकानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रही। मेला क्षेत्र से जुड़ने वाली सड़कों पर जिला प्रशासन ने यातायात प्रतिबंधित कर दिया था।
लोलार्क षष्ठी पर रविन्द्रपुरी स्थित अघोराचार्य बाबा कीनाराम की तप स्थली क्रीं कुण्ड में भी निसंतान दम्पतियों ने सन्तान प्राप्ति के लिए डुबकी लगाई। यहां मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड से भी श्रद्धालु स्नान के लिए एक दिन पहले ही आ गये थे।
काशी में मान्यता है कि लोलार्क कुण्ड में भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर सूर्य की पहली किरण के साथ स्नान करने से सभी मनोकामना पूरी होती है। मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय भगवान सूर्य के रथ का पहिया इसी स्थान पर गिरा था। इससे ही कुंड का निर्माण हुआ था। इसी स्थान पर लोलार्क नाम के असुर का भगवान सूर्य ने वध किया था। यह भी मान्यता है कि महाभारत काल में कुंती को सूर्य उपासना से ही दानवीर कर्ण जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई थी। लोलार्क कुंड में व्रत, अनुष्ठान, स्नान.दान, फलों का बलिदान और लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन से भगवान सूर्य की कृपा से गोद अवश्य भर जाती है।
स्कंद पुराण के काशी खंड के 32 वें अध्याय में उल्लेख है कि माता पार्वती ने स्वयं इस कुंड परिसर में स्थित मंदिर में शिवलिंग की पूजा की थी। एक अन्य कथा है कि विद्युन्माली दैत्य शिव का भक्त था। भगवान सूर्य ने इस राक्षस को परास्त किया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव हाथ में त्रिशूल लेकर सूर्य की ओर दौड़े। दौड़ते समय भगवान सूर्य इसी स्थान पर पृथ्वी पर गिरे। इससे इस स्थान का नाम लोलार्क पड़ा।
इस कुण्ड का जीर्णोद्धार महारानी अहिल्या बाई होलकर,अमृत राव और कूंच बिहार स्टेट के महाराज ने करवाया था। लोलार्क कुंड का वर्णन गहरवाल के ताम्रपत्रों, महाभारत, स्कंदपुराण के काशी खंड में, शिव रहस्य, सूर्य पुराण और काशी दर्शन में विस्तार से किया गया है। उधर,लोलार्क षष्ठी पर्व में उमड़ने वाली भीड़ को लेकर कमिश्नरेट पुलिस सर्तक है। गुरूवार शाम को पुलिस आयुक्त ए सतीश गणेश ने मातहतों संग अस्सी और भदैनी क्षेत्र का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों को भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया।
श्रीधर
