-विधानसभा चुनाव में सक्रियता के बावजूद वोट प्रतिशत में आयी गिरावट के बाद ही निष्क्रिय हो गयी थीं प्रियंका
लखनऊ (हि.स.)। चुनाव दर चुनाव घटते जनाधार ने कांग्रेस का उप्र से मोहभंग कर दिया है। वर्तमान स्थिति देखकर लगता है कि अब उप्र में भाग्य भरोसे ही पार्टी को छोड़ दिया गया है। लगभग छह माह से प्रदेश का अध्यक्ष न मिलना, राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन तिथि की घोषणा होने के बाद भी प्रदेश में पीसीसी सदस्यों का चुनाव न होना यह दर्शाता है कि अब पिछले चुनाव तक सक्रिय रहीं प्रियंका का भी अब उप्र की राजनीति में मन नहीं लग रहा है।
ताजा स्थिति यह है कि प्रदेश में पीसीसी सदस्यों निर्वाचन पहले 16 अगस्त तक ही हो जाना था, लेकिन नहीं हो पाया। फिर प्रदेश के नेताओं को नई तिथि आने की उम्मीद थी, इसके बाद भी तिथि नहीं आयी। बिना माथ (बिना प्रदेश अध्यक्ष) के चल रही कांग्रेस अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में भी हिस्सा नहीं ले सकेगी। इसका कारण है पीसीसी सदस्य ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में हिस्सा लेते हैं और प्रदेश में पीसीसी सदस्यों का चुनाव ही नहीं हुआ।
लोकसभा चुनाव हारने के बाद पहले ही राहुल गांधी यूपी को लगभग छोड़ चुके थे, लेकिन प्रियंका गांधी ने विधानसभा चुनाव में खूब सक्रियता दिखाई। पूरे विपक्ष की अपेक्षा उनकी सक्रियता सर्वाधिक थी। इसके बावजूद कांग्रेस का जनाधार पिछले चुनावों की अपेक्षा कम हो गया। इसके बाद तो प्रियंका का भी मोह भंग हो गया।
सिर्फ सोनिया ही जीत सकी थीं चुनाव
18 मार्च 2019 की वह तारीख याद करें, जब प्रियंका गांधी ने प्रयागराज के संगम तट से नाव की यात्रा बनारस तक शुरू की थी। उस समय ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस प्रदेश में पहले की अपेक्षा ज्यादा बेहतर करेगी। यात्रा में लोगों की भीड़ भी खूब देखने को मिली। मीडिया ने भी खूब सराहा लेकिन 2014 से एक फीसदी से ज्यादा नुकसान होने के साथ ही राहुल गांधी भी अपनी सीट हार गये। पूरे प्रदेश में सोनिया गांधी ही अपनी सीट जीत सकीं। इसके बाद भी प्रियंका की सक्रियता सोनभद्र से लेकर लखीमपुर तक बनी रही। इसके बावजूद विधान चुनाव में करारी हार ने कांग्रेस का ही यूपी से मोह भंग कर दिया है।
बिना प्रदेश अध्यक्ष के चल रही कांग्रेस
कांग्रेस की प्रदेश में निष्क्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव बाद प्रदेश में काेई पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त नहीं हुआ। पूरा प्रदेश बिना अध्यक्ष के चल रहा है। यही नहीं, चुनाव बाद प्रियंका गांधी वाड्रा भी प्रदेश में निष्क्रिय हो गयीं। उनकी सक्रियता अब यहां देखने को नहीं मिल रही है। इससे पहले जब वे उप्र की प्रभारी बनायी गयी थीं तो सोनभद्र में गरीबों के जमीन पर कब्जे का मामला रहा हो या लखीमपुर में किसानों के गाड़ी से कुचलने का मामला, हर जगह सबसे पहले पहुंचती थीं।
लखीमपुर में ज्यादा सक्रिय रहीं थीं प्रियंका
लखीमपुर में तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही पूरा आंदोलन की सक्रियता को ज्यादा दिन तक बनाये रखा। सोनिया गांधी खुद वहां पहुंचकर पूरा माहौल गर्म कर दिया। कई दिनों तक भाजपा बैकफुट पर दिखने लगी थी। उस समय ऐसा लग रहा था कि लखीमपुर सहित कुछ हिस्सों में तो कांग्रेस अपनी सीट निकाल लेगी, लेकिन सब कुछ धरा का धरा रह गया और 2017 के विधानसभा चुनाव में 6.25 प्रतिशत वोट पाने वाली कांग्रेस 2.37 प्रतिशत पर सिमट गयी। यही नहीं पूरे प्रदेश में मात्र दो विधायक ही कांग्रेस के जीत पाये।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा
राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि प्रियंका गांधी वाड्रा और राहुल गांधी का रुख देखकर लगता है कि उप्र से उनका मोह भंग हो गया है। लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी पहले ही यूपी से निष्क्रिय हो गये थे, लेकिन विधानसभा में पहले से भी जनाधार कम होने पर प्रियंका भी यहां निष्क्रिय हो गयीं। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता उमा शंकर पांडेय का कहना है कि पीसीसी सदस्यों के चयन की कोई तिथि तो नहीं आयी है, लेकिन जल्द ही सदस्यों का नाम आ जाएगा।
उपेन्द्र
