Sunday, February 15, 2026
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राष्ट्रीय शर्करा संस्थान की ‘वैनिलिन’ से चमकेगा आइसक्रीम और चॉकलेट बाजार

– महंगी लिग्निन से बनने वाली वैनिलिन को एनएसआई की इजात ‘वैनिलिन’ देगी मात

– संस्थान के वैज्ञानिकों ने दो साल शोध कर गन्ने की खोई से ‘वैनिलिन’ उत्पादन का खोजा स्रोत

कानपुर (हि.स.)। कानपुर जनपद के राष्ट्रीय शर्करा संस्थान में गन्ने की खोई से ‘वैनिलिन’ के उत्पादन में सफलता प्राप्त कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वैनिलिन का सबसे बड़ा उपयोग एक ‘फ्लेवरिंग एजेंट’ के रूप में होता है। विशिष्ट वेनिला स्वाद आमतौर पर मीठे खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होता है। यह जानकारी शुक्रवार को एनएसआई के निदेशक नरेन्द्र मोहन ने शोध के जरिए वैनिलिन की सफल खोज होने पर दी।

उन्होंने बताया कि आइसक्रीम और चॉकलेट उद्योग मिलकर वैनिलिन के कुल उत्पादन का 75 प्रतिशत उपभोग करते हैं तथा कुछ मात्रा में इसका उपयोग कन्फेक्शनरी और बेकरी में किया जाता है। वैनिलिन का उपयोग सुगंध उद्योग, इत्र बनाने, दवाओं की अप्रिय गंध तथा स्वाद को दूर करने के साथ ही पशुओं के चारे व साफ-सफाई उत्पादों में भी होता है।

सबसे सस्ता स्रोत है खोई से प्राप्त वैनिलिन

राष्ट्रीय शर्करा संस्थान के निदेशक नरेंद्र मोहन ने बताया कि, हमने एक सस्ते स्रोत ‘खोई’ से वैनिलिन विकसित किया है जो 2.00-2.50 रुपये प्रति किग्रा की कीमत पर उपलब्ध है। वैनिलिन की ईल्ड यानी प्राप्ति को देखते हुए, जो 0.25 प्रतिशत है, 01 किलो वैनिलिन का उत्पादन करने के लिए, कच्चे माल की लागत केवल रुपये 800-1000 होगी, जबकि लिग्निन आधारित वैनिलिन का बाजार में 7,500-15,000 रुपये प्रति किलो है। नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट के निदेशक ने कहा कि केसर के बाद इसे सबसे महंगा मसाला माना जाता है।

इन श्रोतों से तैयार किया जाता है वैनिलिन

समान्यत वैनिलिन, वेनिला बीन के अर्क से रासायनिक यौगिक के रूप में प्राप्त किया जाता है। लेकिन आज 99 प्रतिशत वैनिलिन, वैनिला बीन्स से नहीं, बल्कि अन्य स्रोतों से उत्पादित किया जाता है। इसे विभिन्न तरीकों से उत्पादित किया जा सकता है जैसे, गुआयाकोल नामक पेट्रोकेमिकल कच्चे माल से, लिग्निन से, या अन्य बायोमास स्रोतों से। आज दुनिया के 15 प्रतिशत वैनिलिन का उत्पादन लिग्निन से होता है, जो बायोमास में उपलब्ध है।

दो वर्ष शोध के बाद मिली सफलता

निदेशक ने बताया कि, गन्ने की पेराई के परिणाम स्वरूप चीनी कारखानों में प्राप्त होने वाली खोई में लगभग 17-25 प्रतिशत लिग्निन होता है और शेष सेल्युलोज और हेमी-सेल्युलोज के रूप में होता है। संस्थान के कार्बनिक रसायन विभाग ने दो साल तक इस पर शोध कार्य किया। कार्बनिक रसायन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव की देख-रेख में अनुसंधान सहायक डॉ चित्रा यादव और ममता शुक्ला ने प्रोजेक्ट फेलो की एक टीम द्वारा खोई में उपलब्ध लिग्निन से वैनिलिन का उत्पादन करने में सफलता प्राप्त की।

सहायक प्रोफेसर डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि इस प्रक्रिया में मोटे तौर पर नियंत्रित परिस्थितियों में लिग्निन का क्षारीय नाइट्रोबेंजीन ऑक्सीकरण शामिल था, जो लिग्निन के वैनिलिन और अन्य फेनोलिक यौगिकों में टूटने का कारण बनता है। कॉलम क्रोमैटोग्राफी या क्रिस्टलीकरण द्वारा वैनिलिन की शुद्धि की गई। हमने थिन लेयर क्रोमैटोग्राफी और एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से उत्पाद की पहचान सुनिश्चित की।

एनएसआई निदेशक ने बताया कि संस्थान ‘दी सुगर टेक्नोलॉजिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के आगामी वार्षिक सम्मेलन के दौरान शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करेगा तथा उसका पेटेंट भी दाखिल किया जाएगा।

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