वीर विक्रम बहादुर मिश्र
रावण का मरना जरूरी नहीं, उसका सुधरना जरूरी है। वह मारा भी इसलिए जाता है क्योंकि सुधरने को तैयार नहीं होता। वह महापंडित है, ज्ञानी है, पर अपने पांडित्य और ज्ञान का उपयोग अपने लिए नहीं करता। सूर्पणखा ने जब उसे बताया कि खरदूषण का वध वन में विचरण करने वाले राम ने कर दिया है तो उसे स्पष्ट आभास हो गया कि धरती पर भगवान का अवतार हो गया। वह समझ गया :
’खरदूषण मोहि सम बलवंता।
तिनहि को मारइ बिनु भगवंता।
सुर रंजन भंजन महि भारा।
जौ भगवंत लीन अवतारा।
तौ मैं जाइ बैर हठि करिहउं।
प्रभु सर लगे प्राण तब तजिहउं।
रावण जानता है कि परमेश्वर के समक्ष जीवन को समर्पित करना चाहिए। पर वह जो जानता है, उसे मानता नहीं। वह समर्पित न होने का बहाना ढूंढ़ता है और कहता है :
’होइहि भजन न तामस देहा।
मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।’ उसे राम के ईश्वरत्व पर पूर्ण विश्वास नहीं है। वह सोचता है कि यदि वे ईश्वर होते तो अपने साथ सुंदर स्त्री लेकर वन में क्यों घूमते। मैं उन पर चढ़ाई कर उनकी पत्नी का हरण करूंगा। उसे अपनी भुजाओं पर बहुत भरोसा है। वह दूसरे किसी को कुछ समझता नहीं।
’भुजबल विश्व वस्यकरि, राखेसि कोउ न सुतंत्र।
मंडलीक मनि रावन, राज करइ निज मंत्र।।’
रावण मनमाना व्यवहार करता है, वह किसी की बात नहीं मानता। व्यक्ति के रूप में वह विशश्रवा मुनि का पुत्र है। पुलस्त्य मुनि का पौत्र है। कोई कितने भी ऊंचे कुल का क्यों न हो, पर यदि उसकी प्रकृति सुंदर नहीं है, तो वह उसे रावण के रूप में प्रस्तुत कर देती है। व्यक्ति के रूप में रावण के वध से कुछ नहीं होने वाला, बल्कि सुधार तब होगा, जब रावण की प्रकृति सुधरेगी। उसका स्वभाव सुधरेगा। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस के बालकाण्ड में रावण के उद्भव के समय की संस्कृति का वर्णन करते हुए लिखा है :
’बाढ़े बहु खल चोर जुआरा।
जे लोभी परधन परदारा।
मानहिं मातु पिता नहिं देवा।
साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।
जिन्ह के यह आचरज भवानी।
ते सब निसिचर जानेहु प्रानी।’
रावण का आचरण जितना ही निकृष्ट है, राम का चरित्र उतना ही उत्कृष्ट है। रावण स्वयं को ही केंद्र में रखकर सब कुछ करता है। जबकि राम सबको केंद्र में रखकर सारे क्रियाकलाप करते हैं। वे अपने शत्रु रावण के भी हित को ध्यान में रखते हैं। अंगद को दूत के रूप में रावण के पास भेजते समय राम स्पष्ट निर्देश देते हैं कि :
काजु हमार तासु हित होई।
रिपु सन करेहु बतकही सोई।’
समाज में सुख शांति की संस्कृति का विकास करना है तो राम की जीवन संस्कृति को अपनाने के लिए जन सामान्य को प्रेरित करना होगा। तभी रावण संस्कृति का विनाश होगा और जनमानस को पूर्ण सुखशांति मिलेगी।
विजय दशमी की बहुत बहुत शुभकामनाएंकृ
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं हनुमान उपासक हैं।)
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