बलिया (हि. स.) जिले की बांसडीह विधानसभा सीट पर नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी इस बार भी सपा उम्मीदवार के रूप में ताल ठोकेंगे। गुरुवार को समाजवादी पार्टी की ओर से जारी प्रत्याशियों की सूची में श्री चौधरी का भी नाम है। अब देखना दिलचस्प होगा कि रामगोविन्द चौधरी बांसडीह से जीत का चौका लगा पाते हैं या नहीं।
बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जाने से पहले छात्र राजनीति से निकले रामगोविंद चौधरी पांच बार चिलकहर (अब अस्तित्व समाप्त) विधानसभा सीट पर जीत का परचम लहरा चुके हैं। परिसीमन के बाद 2008 में चिलकहर विधानसभा सीट का अस्तित्व समाप्त हो जाने पर उन्होंने बांसडीह विधानसभा सीट का रुख किया। रामगोविंद चौधरी वर्तमान में इस सीट से तीसरी बार विधायक हैं। उनसे पहले यह सीट कांग्रेसी दिग्गज बच्चा पाठक का गढ़ थी। बच्चा पाठक सात बार विधायक रहे।कद्दावर कांग्रेसी बच्चा पाठक का विजय रथ रामगोविंद चौधरी ने ही रोका था।
रामगोविंद चौधरी 2002 में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पार्टी समाजवादी जनता पार्टी (सजपा) के टिकट पर बांसडीह विधानसभा सीट से जीत हासिल की थी। बाद में वे सपा में शामिल होकर मुलायम सिंह यादव की सरकार में मंत्री भी बने। श्री चौधरी इस सीट से 2012 में भी सपा से विधायक रहे। अलबत्ता 2007 के चुनाव में वे इस सीट से बहुजन समाज पार्टी के शिवशंकर चौहान से हार गए थे। 2017 के चुनाव में सपा के रामगोविंद चौधरी के सामने भारतीय जनता पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) गठबंधन से ओमप्रकाश राजभर के पुत्र अरविंद राजभर मैदान में थे। हालांकि, भाजपा से बगावत कर चुनाव लड़ीं केतकी सिंह ने निर्दलीय ही रामगोविंद चौधरी को कड़ी टक्कर दी। बावजूद इसके दो हजार से भी कम मतों के अंतर से रामगोविन्द जीत गए थे। तब अरविंद राजभर तीसरे और बसपा के शिवशंकर चौहान चौथे स्थान पर रहे थे। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद 2022 आते-आते प्रदेश की राजनीति ने नई करवट ली है। 2017 में जो ओमप्रकाश राजभर के पुत्र अरविंद राजभर भजपा से गठबंधन के सहारे रामगोविन्द चौधरी के सामने ताल ठोक रहे थे। इस चुनाव में यहां सपा के साथ गलबहियां डाले नजर आएंगे। इस सीट पर राजभर मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी मानी जाती है।
सवर्णों में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या भी निर्णायक है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प है कि सुभासपा से गठबंधन के बाद रामगोविन्द चौधरी की राह कितनी आसान होती है।
पंकज
