Thursday, February 12, 2026
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राज्य : हिसार के केन्द्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान को मिला इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड

उपलब्धि : क्लोन कटड़ा बनाने में नंबर वन बना भारत

हिसार (हि.स.)। हिसार के केन्द्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान को (सीआइआरबी) को सबसे अधिक क्लोन कटड़े बनाने पर इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड से नवाजा गया है। केंद्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र के विज्ञानियों ने भैंस के झोटे से क्लोन कटड़े तैयार करने में भारत को बड़ी उपलब्धि दिलाई है। 
भारत में एक झोटे से सात क्लोन और एक रीक्लोन कटड़ा मौजूद हैं जो एशिया में सर्वाधिक संख्या है। न केवल चीन व थाईलैंड बल्कि सभी एशियन देशों को मिलाकर चार या पांच क्लोन कटड़े मिलेंगे जबकि हिसार में सीआईआरबी के पास कुल 10 क्लाेन कटड़े हैं। इनमें से एम-29 झोटे से 7 कटड़े तैयार किए गए हैं, जबकि हिसार गौरव से एक रीक्लोन कटड़ा बनाया गया है। संस्थान के जिन विज्ञानियों की बदौलत यह उपलब्धि मिली है, उस टीम में टीम लीडर सीआइआरबी के वरिष्ठ विज्ञानी डा. पीएस यादव के नेतृत्व के अलावा डॉ. नरेश एल सेलोकर, डा. धर्मेंद्र कुमार, डा. राजेश कुमार, डा. प्रदीप कुमार, डा. राकेश कुमार शर्मा, डा. मोनिका सैनी और डा. सीमा दुआ शामिल हैं। 
वरिष्ठ विज्ञानी और प्रोजेक्ट हैड डा. प्रेम सिंह यादव ने बताया कि सीआइआरबी की तरफ से क्लोन बनाने का काम 2015-16 में शुरू किया गया था। सबसे पहले हिसार गौरव नस्ल की भैंस का क्लोन तैयार किया। क्लोन तैयार होने के साथ ही ढाई से तीन साल बाद इसके स्पर्म से टीका तैयार किया जा सकेगा। एक कटड़े के क्लोन से उसकी उम्र में एक से डेढ़ लाख टीके तैयार हो सकेंगे, यानि आठ कटड़ों के क्लोन से 10 से 15 लाख टीके तैयार होंगे। उससे 5 से सात भैंसों को लगाया जा सकेगा। इससे अच्छी नस्ल के झोटे मिल सकेंगे।
संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार सामान्य कटड़े के जन्म के लिए एक मादा व एक नर पशु का होना जरूरी है परंतु क्लोन तैयार करने के लिए शरीर के किसी भी हिस्से से टीशू लिया जाता है। सीआईआरबी के विज्ञानी पशु की पूंछ से टीशू लेते हैं। उसको लैब में ले जाकर कोशिकाएं बनाई जाती है। उन कोशिकाओं में से एक कोशिका को लिया जाता है जिसे डोनर कोशिका कहते हैं। डोनर कोशिका को मादा के अंडे के अंदर डाल दिया जाता है। अंडे के केंद्रक को पहले ही निकाल दिया जाता है ताकि उसमें मादा पशु के गुण न बचें। डोनर सेल को डाल दिया जाता है। इस भ्रूण को आठ दिन तक लैब में रखते हैं इसके बाद इसे मादा पशु के गर्भाशय में रोपित किया जाता है।

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