Wednesday, January 14, 2026
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राजा दशरथ ने यूं दी राम, लक्ष्मण को सीख

डा. रश्मि

अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदय लाइ बहु भाँति सिखाए।।
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।
तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस के बालकांड की इस चौपाई में गुरु की महत्ता दर्शाई गई है। यह बात तब की है, जब मुनि विश्वामित्र राजा दशरथ से अपने यज्ञ की विघ्न रहित पूर्ति हेतु उनके पुत्रों को मांगने आते हैं। किसी भी माता-पिता के लिए अपने लाडलों को खुद से दूर भेजना असहनीय होता है। जबकि यहां तो उनके पुत्रों को जंगल जाना था, वह भी राक्षसों को मारने के लिए। ऐसे में हृदय को कष्ट पहुंचना और मन में चिंता जागना स्वाभाविक है। किंतु जब गुरु वशिष्ठ राजा दशरथ को समझाते हैं, तब वह अपने पुत्रों को उनके साथ भेजने के लिए सहमत हो जाते हैं। इस चौपाई में माता-पिता द्वारा दिए जाने वाले संस्कार और सीख का सुंदर वर्णन मिलता है। संस्कारी माता-पिता हमेशा अपने बच्चों को उच्च आदर्श ही प्रदान करते हैं। इस चौपाई का हर शब्द ध्यान देने योग्य है। राजा दशरथ ने बड़े आदर से अपने दोनों पुत्रों को बुलाया। मित्रों! यहां ’आदर’ शब्द पर ध्यान दीजिए। यदि माता-पिता अपने बच्चों के साथ सम्मान पूर्वक बात करते हैं तो बच्चा भी सदैव सबका सम्मान करना ही सीखता है। हम बच्चों को छोटा जानकर अपमानित करें तो इसका प्रतिफल हमें ही भुगतना पड़ेगा।
आगे ध्यान दीजिए-उन्हें हृदय से लगाकर समझाते हैं। चूंकि पिता आयु में बड़े हैं, अनुभवी हैं, अतः बालकों को समझा रहे हैं। किंतु वह भी कैसे? हृदय से लगाकर। आज्ञा देकर भी करवा सकते थे, झिड़क कर भी काम बता सकते थे लेकिन नहीं! वे तो हृदय से लगाकर कार्य करवाना चाहते हैं। इन तीनों तरीकों में बहुत बड़ा फर्क है। यही कारण है कि बचपन में माता-पिता से मिलने वाले व्यवहार का असर बच्चे में बड़े होने के बाद परिलक्षित होता है। अपने बच्चों के सामने ही राजा दशरथ गुरु वशिष्ठ से कहते हैं-’मेरे पुत्र मेरे प्राण हैं।’ इस बात में गुरुवर के लिए यह संकेत है कि आप हर संभव इनका ध्यान रखें। ’प्राण’ शब्द एक पिता की व्याकुलता, दीनता और स्नेह के चरम को रेखांकित करता है। फिर आगे वे यह भी जोड़ देते हैं ’हे मुनि! अब आप ही इनके पिता हैं।’ ऐसा कहकर वे गुरु और शिष्य को स्नेह की डोर से बांध देते हैं। यदि सभी माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षकों के भीतर अपना अभिभावक देखने की सीख दें तो गुरु और शिष्य के रिश्ते पुनः आदर और प्रेम से भर उठेंगे। यदि गुरु को भी अपने शिष्यों में पुत्र-पुत्री दिखने लगें तो वे हमेशा उनका भला ही सोचेंगे। आज जब हर रिश्ते में स्वार्थ घर कर गया है, संस्कार और आदर्श होते जा रहे हैं, ऐसे में यह चौपाई अमूल्य है। यह सिखाती है कि आदर्श टीचर कैसे हों? आदर्श स्टूडेंट कैसे हों? माता-पिता टीचर और स्टूडेंट के बीच किस प्रकार से सेतु का दायित्व निभाएं?

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