Wednesday, January 14, 2026
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राजनीति के अपराधीकरण पर वार करने का सही समय

दिनेश पाठक

आखि़रकार मुख़्तार अंसारी का उत्तर प्रदेश आगमन हो गया। यह शातिर जल्दी ही अपने गृह राज्य की जेल में होगा। पर, मुख़्तार और उस जैसे आपराधिक प्रवृत्ति के अनेक राजनीतिक लोग पूरे सिस्टम पर सवाल हैं। लम्बे समय से सजायाफ्ता बंदी के रूप में इस जेल से उस जेल की यात्रा कर रहे इस व्यक्ति को आज तक चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सका। वह जेल से चुनाव लड़ता है और हर बार चुना भी जाता है। उसकी तरह अनेक हैं। विधायकों की सूची उठाकर देख लें तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यह हमारे कानून की कमजोरी है। खामी है। अफसरों का नाकारापन है। कानून को तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल करने का बेहद खतरनाक नतीजा है। मुख़्तार अंसारी के उत्तर प्रदेश वापसी का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तो अपने कानून की खामियों पर भी चर्चा करनी होगी। लिखना होगा। एक अपराधी के ताकतवर होने का यह पुख्ता प्रमाण है लम्बे समय तक कानून की आड़ लेकर यूपी आने से बचना। हमारी न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को सोचना होगा कि कानून की ऐसी कमजोर कड़ियों को यथासंभव जल्दी से जल्दी मजबूत किया जाए। अन्यथा, गली-गली में घूम रहे मुख़्तार अंसारी जैसे अपराधी कानूनी कमजोरियों का लाभ उठाते रहेंगे और सिस्टम का मजाक उड़ता रहेगा। यद्यपि जब भी इस कड़ी को दूर करने की कोशिश होगी तो राजनीति से कुछ और अपराधी प्रवृत्ति के संसद सदस्य, विधायक बाहर हो जायेंगे। समय की मांग है कि यह काम होना चाहिए। हमारी जिम्मेदार एजेंसियाँ इस दिशा में पहल करेंगी, फिलहाल मुझे शक है। जब तक येन-केन-प्रकारेण सत्ता में रहने का लालच राजनीतिक दल नहीं छोड़ पायेंगे, तब तक यह यक्ष प्रश्न बना रहेगा।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक अपराधीकरण का इतिहास अब काफी जड़ें जमा चुका है। कह सकते हैं कि लास्ट स्टेज का कैंसर है। यही सही समय है कि चुनाव आयोग, संसद, विधान सभाओं के अलावा न्यायपालिका भी पहल करें, जिससे यह महामारी खत्म हो सके और प्रदेश में एक सकारात्मक माहौल तैयार हो। अच्छे लोग चुनाव लड़ें और जीतकर सदनों में हमारा नेतृत्व करें। एक आँखों देखी याद आ रही है। मुख़्तार लखनऊ जेल में सजायाफ्ता कैदी थे। मायावती की सरकार थी। इलाज के बहाने केजीएमयूं गये और वहाँ से सीधे डीजीपी दफ्तर आ गये। गेट पर गाड़ी रुकी। मुख़्तार उतरे और दोनों हाथ ऊपर कर अंगड़ाई ली। चारों ओर देखा फिर भीड़ के साथ अंदर प्रवेश कर गये। गेट पर किसी भी सुरक्षा कर्मी ने किसी भी तरह की रोकटोक या रजिस्टर में एंट्री तक की जहमत नहीं उठाई। वे सीधे आईजी स्थापना के कमरे में पहुंचें। आईजी साहब दरवाजे पर खड़े इंतजार कर रहे थे। कुछ कागज आईजी को देकर मुख़्तार ने भोजपुरी में पूछा कि हो जाएगा न? कोई दिक्कत तो नहीं होगी? आईजी ने हाँ में सिर हिला दिया। मैं उसी भीड़ का हिस्सा था। कागजों के उस पुलिंदे में लगभग दो सौ से ज्यादा सिपाही, दीवान और दरोगा के तबादले की सूची थी।
मैं उस समय हिंदुस्तान अखबार का चीफ रिपोर्टर था। हमारे साथी समेत कुछ और फोटो जर्नलिस्ट ने डीजीपी दफ्तर के सामने उनकी तस्वीर उतार ली। मुख़्तार मुस्कुराते हुए चले गये। बाद में पता चला कि मुख़्तार ने सभी को बारी-बारी बुलाकर मुलाक़ात की। यह भेंट दारुलशफा में हुई। मैं दफ्तर पहुँचा। चार बजे मेरे साथी छायाकार आये और बताया कि उन्हें मुख़्तार ने दारुलशफा बुलवाया था। बोला-यह फोटो अख़बार में छपने से क्या बन जाएगा और न छपने से क्या बिगड़ जाएगा? जब साथी ने मुझे यह जानकारी दी तो उनके सामने ही मैंने फोटो फाड़ दी। मैंने कहा-यह फोटो नहीं छपेगी। मुख़्तार ने सही ही कहा है कि इससे छपने से क्या बिगड़ेगा? जाँच तो अफसरों को ही करनी है। मुझे अपने साथी की जिन्दगी प्यारी थी इसलिए यह फैसला लिया। क्योंकि अपराधियों के लिए एक जिन्दगी की कोई ख़ास कीमत नहीं होती है पर सामान्य आदमी के लिए एक जिन्दगी के होने या न होने मायने रखती है। खैर, बिना फोटो खबर छपी। पर, नाकारा सिस्टम सोता रहा। मेरी अंतिम जानकारी तक इस सिलसिले में कोई भी रिपोर्ट अदालत तक नहीं पहुंची। सजायाफ्ता कैदी को लेकर केजीएमयू, डीजीपी दफ्तर और दारुलशफा के चक्कर लगाने वाले पुलिस के दस्ते ने भी कानून को अनदेखा किया। जेल से भी कोई रिपोर्ट अदालत तक नहीं पहुँची।
यह सब मुख़्तार के जलजले का असर था। वीआरएस ले चुके डीएसपी शैलेन्द्र सिंह के मुकदमे वापसी के सरकार के फैसले के बाद एक बार फिर मुख़्तार अंसारी चर्चा में हैं और पूरी घटना नजरों के सामने फिल्म की तरह चल पड़ी। एलएमजी समेत अन्य हथियारों की बरामदगी के बावजूद घटिया सिस्टम ने उसी पुलिस अफसर शैलेन्द्र सिंह को न केवल सताया बल्कि पुलिस के सीनियर्स ने भी उस युवा अधिकारी का साथ देना मुनासिब नहीं समझा। बाद में शैलेन्द्र के साथ क्या-क्या हुआ, यह भी किसी से छिपा नहीं है। बात घूमकर फिर सिस्टम पर ही आती है। सत्ता के इशारे पर जिन अफसरों ने शैलेन्द्र सिंह के मुकदमे की वापसी की फाइल तैयार की, वही या उनके ही कैडर के लोगों ने उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किये थे। जो अधिकारी आज मुख़्तार को पंजाब से लाने पर फाइल की रफ़्तार तेज किये हुए हैं, उन्हीं के सीनियर-जूनियर अफसरों ने मुख़्तार जैसों को संरक्षण दिया है। समय माँग कर रहा है कि अब यह सिलसिला बंद हो। अपराधियों को उनकी जगह रखा जाए। राजनीति का अपराधीकरण बंद हो। ये सभी फैसले कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका को मिलकर करने होंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मोटीवेशनल स्पीकर हैं।)

यह भी पढ़ें : एम्बुलेंस फर्जीवाड़े में भी मुख्तार पर नकेल

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