अयोध्या (हि.स.)। अरुणांचल प्रदेश में इटानगर से थोड़ा आगे रोनो हिल्स पर दोइमुख में राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थित है। यहां के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर कोथेन लेगो जी बताते हैं कि देश की पूर्वी सीमा मणिपुर में 1467 ईस्वी में मणिपुर के राजा कियांबा को म्यामार के पोंग राजा खेखोंभा ने भगवान विष्णु की मूर्ति भेंट किया था। मणिपुर के राजा ने रामानंदी सम्प्रदाय का व्यापक प्रचार-प्रसार कराया था। उसी समय से मणिपुर में रामकथा का प्रचलन शुरू हो गया था। यहां पर दशहरे के दिन को रामणकप्पा अर्थात रावण वध का दिन मनाते हैं। यहां पर श्रीराम के नाम पर यहां के राजाओं ने सिक्के भी जारी किए हैं।
अयोध्या में अंकुरित, पुष्पित और पल्लिवित हुई संस्कृति अवध का अतिक्रमण करते हुए पूरे देश-दुनिया में फैल गई। यहां तक कि लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण अंग बनकर संस्कृति में रच बस गई। अयोध्या के रामलला, वनवासी राम, राजा रामचंद्र और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से गढ़े गए प्रतिमान और संस्कार लोगों के दिलों में बैठ गए जो इहलौकि और पारलौकिक जीवन दर्शन को समेटे थी। श्रीराम की संस्कृति का प्रभाव ही है कि रामलीला देश के सभी प्रांतों में अलग-अलग भाषाओं, बोलियों में आज भी प्रचलित है।
पूर्वोत्तर के मातृप्रधान समाज को भारत का गर्भनाल कहा जाता है, जहां भारत पैदा हुआ है। भगवान कृष्ण की ससुराल पूर्वोत्तर हैं। आज भी यहां पर रुकमंद जनजाति है तो अर्जुन की धर्मपत्नी उलुपी के नाम से यहां एक जिला है। भीम की ससुराल हिडिम्बा जिसे कालांतर में दीमापुर कहा गया। राजबाड़ी की वह गोल पहाड़ियां जिससे घटोत्कच खेला करते थे। यहां पर राम और रामायण का प्रभाव गहरे तक व्याप्त है। विभिन्न भाषा, बोली और स्थानीय संस्कृति में कश्मीर से कन्याकुमारी, अटक से कटक तक राम किस प्रकार रमते हैं, इसे देखना भी आवश्यक है। उड़ीसा में उड़िया भाषा में गोस्वामी तुलसीदास के श्री रामचरित मानस के आधा दर्जन से अधिक अनुवाद मिल जाएंगे। यहां पर धूमधाम से श्रीरामलीला का मंचन किया जाता है, साथ ही यहां के समाज में हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है। प्रमुख तीर्थ जगन्नाथ पुरी में रामनवमी को भव्य आयोजन किया जाता है। रामानुज संप्रदाय का एम्मार मठ यहीं पर है। यहां की लोक कला और चित्रकला में श्रीराम लोकमानस में गहरे तक उतरे हैं।
झांसी के पास ओरछा में तो राजाराम का प्रसिद्ध मंदिर है जिसकी महिमा किसी भी तरह अयोध्या से कम नहीं कही जा सकती। महाकवि कालीदास अपने कृति मेघदूत में चित्रकूट के रामगिरी आश्रम को प्रसिद्ध रामतीर्थ कहा है। बुंदेलखंड से ही सटा हुआ पन्ना जिला है, जहां के नचना गांव में श्रीराम से जुड़ी मूर्तिकला का पहला अंकन किया गया है। इसी तरह झांसी के देवगढ़ के विष्णु मंदिर में भी ऐसी ही मूर्तिकला देखने को मिलती है। कालिंजर के दुर्ग का पांचवां दरवाजा हनुमान द्वार कहा जाता है।
इसी तरह राजस्थानी चित्रकला में श्रीराम का अद्भुत प्रभाव देखने को मिलेगा। मेवाड़ शैली में रामायण का चित्रांकन देखने लायक है। इसी तरह मेवाड़, कोटा, बूंदी, किशनगढ़, अलवर, बिकानेर, जयपुर में श्रीराम चरित मानस और वाल्मीकि कृत रामायण के आधार पर अद्भुत चित्र बनाए गए हैं। इसके अलावा राजस्थानी लोकगीतों में भी श्रीराम चरित्र का गायन किया जाता है।
गुंटुर जिले में जटायु ने रावण से युद्ध किया था। पंचवटी गोदावरी नदी के तट पर आंध्रप्रदेश के गुंटुर जिले में ही स्थित है। यही पर शबरी का आश्रम भी है। इसके अलावा किष्किंधा पर्वत भी आंध्रप्रदेश में ही है जहां सुग्रीव और राम की मित्रता हुई थी। यहीं पर बालि का वध किया गया था। केरल हाईकोर्ट में अधिवक्ता और योग शिक्षक जगदीश लक्ष्मण बताते हैं कि आप मेरा ही नाम देख लिजिए इससे आपको तमिलनाडू और केरल में श्रीराम के प्रभाव का अंदाजा हो जाएगा। मैं केरल का हूं, मलयाली हूं लेकिन मेरा नाम जगदीश लक्ष्मण है। केरल और तमिलनाडू के घर-घर में लोग मिलेगें जिनका नाम रामायण के पात्रों के नाम पर हैं। हमारे यहां रावण, मेघनाथ, कुंभकरण का पुतला दहन नहीं किया जाता लेकिन दशहरे के समय रामायण का पाठ किया जाता है। हनुमान जी की पूजा और सुंदरकांड घर-घर होता है।
मार्कण्डेय पाण्डेय/मोहित
