संजय स्वतंत्र
आम लोगों को कैंसर मौत का वारंट जैसा लगता है तो दूसरी ओर यह जटिल रोग आज भी चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है। मनुष्य आज भी इस रोग से लड़ रहा है। डॉ. वृंदा सीताराम ने इसे जीवन का खेल के रूप में चित्रित किया है। उनका कहना है कि जिंदगी ताश के पत्तों की तरह ही है। आपको शायद अच्छे पत्ते न मिलें, लेकिन जो कुछ आपको मिला है उससे आपको खेलना ही पड़ता है। यानी किसी को कैंसर हो जाता है तो उससे लड़ना ही होगा। चाहे लड़ाई जितनी लंबी चले या फिर कोई हार ही क्यों जाए। अब कैंसर को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि न केवल पूरे विश्व में बल्कि भारत में भी कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ रही है।
कैंसर ऐसा रोग है जो शरीर के किसी भी अंग को अपनी चपेट में ले सकता है। आखिर क्या है कैंसर? दरअसल, कैंसर होने पर कोशिकाओं के स्वरूप में बदलाव आता है। संख्या में बढ़ गई ये कोशिकाएं अनियंत्रित ढंग से विभाजित होने लगती हैं। फिर ये ट्यूमर का रूप लेने लगती हैं। यही कैंसर आसपास के उत्तकों, लसिका एवं रक्त के माध्यम से दूसरे अंगों को भी प्रभावित करने लगता है। एक अनुमान है कि देश में हर साल लगभग पांच लाख लोग कैंसर के मरीज हो जाते हैं। 1990 में 81 लाख रोगियों का पता चला था तो साल 2000 में कैंसर रोगियों की संख्या एक करोड़ एक लाख हो गई थी। तो इस लिहाज से इस रोग को समझना बेहद जरूरी हो गया है। विख्यात जन स्वास्थ्य विज्ञानी डॉ. एके अरुण की हालिया प्रकाशित पुस्तक कैंसर को समझना क्यों जरूरी है-आम लोगों को न केवल आगाह करती है बल्कि जीने की राह भी दिखाती है। वे लिखते हैं कि ज्यादातर मरीजों में रोग की शुरुआत में लक्षण प्रकट नहीं होते। इससे मर्ज का पता रोग बढ़ने पर ही चल पाता है। जबकि उपचार की सफलता की संभावना क्षीण हो जाती है। इसलिए इस रोग का शक कब करें, यह भी वे बताते हैं। स्तन में रसौली या गांठ, मस्सों के आकार में तेजी से बदलाव, लंबे समय तक पाचन संबंधी समस्या, नाक, मुंह, मल-मूत्र से रक्तस्राव, दीर्घकालीन खांसी, वजन में अकारण कमी, महिलाओं में मासिक के दौरान ज्यादा रक्तस्राव या सामान्य यौन संबंध के दौरान खून बहना अदि लक्षण हो तो सतर्क हो जाना चाहिए। डॉ. अरुण कैंसर के स्थानीय लक्षण भी बताते हैं। उनके मुताबिक मुंह में सफेद या लाल चकत्ते और घाव जो उपचार के बावजूद नहीं भरते, मुंह में कैंसर होने की पूर्व दशा के द्योतक हो सकते हैं। इसी प्रकार गुटखा व तंबाकू सेवन करने वाले लोगों में मुंह की झिल्ली के कड़े होने के कारण वे मुंह पूरी तरह नहीं खोल पाते। यह भी कैंसर की पूर्व दशा होती है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का मुंह चार अंगुलियों के बराबर खुलता है। वे कहते हैं कि उन्होंने ऐसे रोगियों को देखा है जिनका मुंह एक या दो अंगुल ही खुल पाता है। इसी तरह अमाशय में कैंसर के कारण खून की उल्टी हो सकती है।
रोग की अंतिम स्थिति में प्रायः वजन कम हो जाता है। फेफड़ों, आंतों, अंडाशय, शुक्राशय के कैंसर में वजन कम होना आम बात है। जबकि मस्तिष्क और स्तन कैंसर में प्रायः वजन कम नहीं होता। कैंसर मरीजों के शरीर में जमा वसा समाप्त हो जाती है। मांसपेशियां सूखने लगती हैं। शरीर हड्डियों का कंकाल भर रह जाता है। कैंसर रोगी को भूख कम लगती है। स्वाद बदल जाता है। कुछ अंगों के कैंसर रसायन और हार्मोन का स्राव करने लगते हैं। जिसके कारण कई समस्याएं पैदा होने लगती हैं। एक लक्षण ये भी है कि ऐसे मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है। मगर अधिकांशतः प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में होते हैं। क्योंकि कैंसर विकसित होने में कई साल लग जाते हैं। शोधों से पता चलता है कि विभिन्न अंगों में कैंसर का प्रकोप विभिन्न देशों और स्थानों में अलग-अलग होता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि कैंसर का संबंध व्यक्ति की जीवन शैली, वातावरण, भोजन, संक्रमण आदि से हो सकता है। अधिकतर रोगियों में कैंसर होने का कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता। वैज्ञानिकों की मान्यता अनुसार यह रोग दो चरणों में होता है। पहले चरण में गुणसूत्र में बदलाव होता है। दूसरे चरण में ऑनकोजीन उत्तेजित हो जाते हैं। ये कई कारणों से जैसे विषाणु, प्रदूषण, रसायनों, भोज्य पदार्थों और तंबाकू-सिगरेट के कारण सक्रिय होते हैं। डॉ. अरुण लिखते हैं कि वैज्ञानिक ऐसी चिप बनाने में लगे हुए हैं, जिसे त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित किया जाएगा। यह गुणसूत्रों में बदलाव की सूचना कंप्यूटर को देगी। इससे कैंसर होने की आशंका होने पर अन्य जांच कर कैंसर रोग की पुष्टि की जा सकेगी और उपचार किया जा सकेगा। अभी हाल में ही वैज्ञानिकों ने ऐसी इलेक्ट्रॉनिक नाक बनाई है जो गंध में कैंसरकारक रसायनों को सूंघ कर फेफड़े के कैंसर की पूर्व सूचना देने में सक्षम है।
डॉ. अरुण की इस पुस्तक में एक अहम अध्याय है-कैंसर से कैसे निपटें। दरअसल, कैंसर शब्द जो हमने दिया है। यह लोगों के मेरुदंड में दंश की तरह चुभता है। इसके उलट आप मधुमेह को लीजिए। लोग इस पर बात करने से नहीं हिचकिचाते- अरे, तुम चालीस के हो गए और मधुमेह से बचे हुए हो। कुछ लोग इसे समृद्धि से जोड़ते हैं। मेरे विचार से मधुमेह एक असाध्य रोग है जो लोगों की जीवन शैली को बदल देता है। तो मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग के लिए किसी प्रकार का शोर नहीं मचाया जाता। लेकिन कैंसर के नाम से लोग घबरा जाते हैं। साहस खोने लगते हैं। दरअसल, हमारी कल्पनाशक्ति कैंसर को प्राणघातक रूप में देखती है। इसलिए मनुष्यों को इस घुसपैठिए के खिलाफ प्रचंड संघर्ष करना होगा। इस रोग को देखने का नजरिया तभी बदलेगा जब हमें इसके बारे में स्पष्ट समझ होगी। कैंसर असामान्य विषाणुओं का एक समूह है। उन्हें अकसर पागल, अड़ियल और सनकी विषाणु कहा जाता है। सामान्य कोषाणु अति उत्साही हो जाते हैं। वे प्रकृति के प्रजनन के तरीके का उल्लंघन करते हैं। तेजी से बढ़ते हैं और शरीर के सामान्य कार्य को बदल देते हैं। यदि इन पर नियंत्रण न किया जाए तो इसमें शरीर के दूसरे हिस्सों में चले जाने की क्षमता होती है। इस पुस्तक में कैंसर के उपचार में प्रगति, इस रोग में आहार, हार्मोन से कैंसर का उपचार, कैंसर : तथ्य और गलत धारणाएं और कैंसर रोग से संबंधित कुछ शोध जैसे अध्याय दिए गए हैं। जो आम पाठकों के साथ रोगियों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
डॉ. अरुण चूंकि जाने माने जन स्वास्थ्य विज्ञानी हैं इसलिए उन्होंने एक अध्याय कैंसर से इलाज में होमियोपैथी पर भी रखा है। उन्होंने लिखा है-मेरी राय में कुछ कैंसर होमियोपैथिक दवाओं से ठीक किए जा सकते हैं। जैसे त्वचा कैंसर, लीवर कैंसर, अस्थि कैंसर, स्तन कैंसर, यूटेराइन कैंसर, ब्लाडर कैंसर, अंडाशय के कैंसर लिम्फोमा और रक्त कैंसर आदि में अनुभवी होमियोपैथिक चिकित्सक अच्छा उपचार कर सकते हैं। इस पद्धति से उपचार में शरीर की स्थिति सामान्य रहती है। मरीज लंबे समय तक सहज जीवन जी लेता है। चिकित्सक एवं लेखक डॉ अरुण का दावा है कि अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से उपचार के मुकाबले होमियोपैथिक उपचार न केवल सस्ता बल्कि अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव, सर्जरी और रेडिएशन/कीमोथेरेपी से होने वाली विकृति से भी शरीर बचा रहता है। उनका निजी अनुभव यह है कि होमियोपैथिक उपचार से कैंसर के मरीज शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्तर पर सुकून से जीते हैं। अंत में सबसे बड़ी बात यह कि जब तक जीवन है, इसका हर लम्हा जिया जाए जैसे फिल्म सफर और आनंद के नायक ने जिया। आज के दौर में जब पूरा जीवन अर्थिक-पारिवारिक चुनौतियों से लड़ने में निकल जाता है, तो ऐसे में कुछ जटिल और असाध्य बीमारियां न केवल व्यक्ति को बल्कि उसके परिवार और दोस्तों को हिला कर रख देती हैं। अभी फिल्म सफर का ही एक गीत याद आ रहा है जिसका भाव यह है कि कितनी भी मुश्किलें हों आपको हर हाल में चलते जाना है-
नदिया चले चले रे धारा
चंदा चले चले रे तारा,
तुझको चलना होगा…
जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आंधी से तूफां से डरता नहीं है
तू जो ना चलेगा, तो चल देंगी राहें…
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा सम्प्रति जनसत्ता दिल्ली से जुड़े हैं।)

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