– ऊंट पर बैठे दो नगाड़ेबाज लयबद्ध स्वर में डंका बजाते रहे
-मौलाना की तकरीर सुन शिया मुसलमान बिलख पड़े
वाराणसी (हि.स.)। धर्म नगरी काशी में मुहर्रम की 11वीं तारीख पर रविवार को दालमंडी से लुटे काफिले का जुलूस (चुप का डंका) पूरी अकीदत के साथ उठाया गया। दालमंडी स्थित मरहूम डॉ.नाजिम जाफरी के आवास से निकले लुटे काफिले के जुलूस में सबसे आगे ऊंट चल रहा था। उस पर बैठे दो नगाड़ेबाज लयबद्ध स्वर में डंका बजा रहे थे। जगह-जगह लोग फरहरा को छूते तो दुलदुल को दुपट्टा, फूल चढ़ाते और दूध, मिठाई, काजू आदि खिला रहे थे। रास्ते में महिलाएं घरों की छतों से जुलूस देख रही थीं।
जुलूस निकलने के पूर्व मौलाना ने नूरानी तकरीर पेश की। तकरीर में जब उन्होंने लुटे हुए काफिले का मंजर बयां किया तो काले कपड़े पहने गम में डूबे शिया समुदाय के लोग बिलख पड़े। रास्ते में सैयद फरमान हैदर ने कलाम पेश किया। अशरे को भी शब्बीर का जो गम नहीं करते, वो पैरवी-ए-सरवरे आलम नहीं करते, हिम्मत हो तो महशर में पयंबर से भी कहना, हम जिंदा-ए-जावेद का मातम नहीं करते। जुलूस नई सड़क से आगे बढ़ा तो लोगों ने रास्ते में अपने कलाम पेश किये।
इस दौरान पूरा काफिला खामोश होकर चल रहा था। अंजुमन हैदरी के नौजवान अलम का फरहरा लहराते हुए चल रहे थे। जुलूस नई सड़क, शेख सलीम फाटक, कालीमहल, पितरकुण्डा, लल्लापुरा होते हुए दरगाहे फातमान पहुंचा जहां पर इमाम हुसैन के कुनबे के रौजे पर खेराज-ए-अकीदत पेश किया गया।
हाजी फरमान हैदर ने बताया कि इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीदियों ने शहीदों के काफिले लूट लिए थे। यही नहीं ख्वातीन (महिलाओं) के सिर से चादरें छीन ली थीं और उनके खेमे जला दिए गए थे। उन्हें कैदी बना लिया गया था। इसी की याद में ग्यारहवीं मुहर्रम को निकलने वाले जुलूस को लुटे हुए काफिले का जुलूस कहते हैं।
श्रीधर/राजेश
