Thursday, April 9, 2026
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महाशिवरात्रि विशेष : महादेवा कुन्तेश्वर व पारिजात धाम का अपना है अलग महत्व

– जलाभिषेक कर श्रद्धालु पाते है मनोवान्क्षित फल

बाराबंकी (हि.स.)। सरयू उच्छल जलधि तरंग तोया बाराह बन के नाम से विख्यात जनपद बाराबंकी का पौराणिक दृष्टि से अपना अलग ही महत्व है। यहां पर देवाधिदेव महादेव का पवित्र तीर्थ स्थल महादेवा कुंतेश्वर धाम पारिजात धाम समेत कई तीर्थ स्थल व पर्यटक स्थल विद्यमान हैं।

भगवान शिव की नगरी महादेवा के अद्भुत शिवलिंग के पृथ्वी पर प्रकट होने के संबंध में कहा जाता है कि महाभारत काल से पूर्व भगवान शिव को एक बार फिर से पृथ्वी पर प्रकट होने की इच्छा हुई तो पंडित लोधे राम अवस्थी जो एक विद्वान ब्राह्मण सरल दयालु और अच्छे स्वभाव वाला ग्रामीण था। एक रात भगवान शिव ने सपने में उसे दर्शन दिए अगले दिन लोधेराम जो पुत्रहीन था अपने खेत में सिंचाई करने गया तो उसने वहां एक गड्ढा देखा जहां पर सिंचाई का पानी पृथ्वी में जाकर गायब हो रहा था। उन्होंने उस गड्ढे को पाटने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन असफल घर लौटा रात में उसने फिर से उसी स्थान को अपने सपने में देखा मानो उससे कोई कह रहा हो गड्ढे में जहां पानी जाकर गायब हो रहा है वहां मेरा स्थान है वहां मुझे स्थापित करो।

इससे मुझे तुम्हारे नाम से प्रसिद्धि मिलेगी ऐसा कहा जाता कि अगले दिन जब लोधे राम गड्ढे की खुदाई कर रहा था तो उसका उसका फावड़ा किसी कठोर वस्तु से टकरा गया। उसने अपने सामने एक शिवलिंग देखा, जिससे रक्त स्राव हो रहा था। इस दृश्य से लोधे राम भयभीत हुआ, परंतु उसने खुदाई जारी रखी मूर्ति के दूसरे छोर तक पहुंचने में असफल रहा। उसने उसे ज्यों का त्यो छोड़ दिया और उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवा दिया। जिसे अर्ध नाम लोधे और भगवान शिव के ईश्वर का नाम दिया। इस प्रकार भक्त के नाम अर्थात लोधेश्वर से प्रसिद्ध हो गया। तत्पश्चात ब्राह्मण को चार बेटों का आशीर्वाद मिला। महादेवा, लोधौरा, गोबरहा और रजनापुर उनके बेटों के नाम से चार गांव बस गए। महाभारत के बाद पांडवों ने इस स्थान पर महायज्ञ का आयोजन किया, जहां एक कुआ है जो आज भी पांडव कूप के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस कूप में आज भी आध्यात्मिक गुण है, जो कोई इसके पानी को पीता है कई बीमारियां ठीक हो जाती है।

जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर पूरब रामनगर टिकैतनगर रोड पर कस्बा बदोसराय के मुख्य चौराहे से दो किलोमीटर उत्तर में कुंतेश्वर धाम मंदिर स्थित है, जहां पर सावन मास के प्रत्येक सोमवार सोमवती अमावस्या महाशिवरात्रि पर माता कुंती द्वारा स्थापित अद्भुत शिवलिंग का जलाभिषेक करके श्रद्धालु मनोवाक्षित फल प्राप्त करते हैं।

कुंतेश्वर महादेव मंदिर की पौराणिकता के संबंध में जनश्रुति है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपना कुछ समय घाघरा नदी के तट पर व्यतीत किया था। एक समय पांडवों की माता कुंती ने अपने पुत्रों से शिवार्चन करने की इच्छा प्रकट किया। माता की आज्ञा पाकर महाबली भीम पर्वतमालाओं में विचरण करते हुए एक शिवलिंग को बहंगी में रखकर चले। उन्हें चलने में जब असुविधा हुई तो उसी के आकार का दूसरा शिवलिंग उन्होंने बहंगी के दूसरी ओर रख लिया और लाकर अपनी माता कुंती को दे दिया। उसमें से एक शिवलिंग को माता कुंती ने घाघरा नदी के तट पर अपने हाथों से प्रत्यारोपित किया और उस स्थान का नाम कुंतेश्वर धाम रख दिया। धीरे-धीरे वहां पर आबादी बढ़ने लगी और कुंतीपुर के नाम से एक गांव बस गया जो कालांतर में कुंतीपुर से अपभ्रंश होकर के किन्तूर में परिवर्तित हो गया।

एक समय की बात है महाभारत काल में पांडवों की माता कुंती और दुर्योधन की मा गान्धारी एक ही समय उक्त स्थान पर पूजा अर्चना करने आयी और अपने अपने पुत्रों के विजय की कामना करने लगी। इस पर वहां एक आकाशवाणी हुई कि कल प्रातः काल जो मेरा प्रथम स्वर्ण पुष्पों से शिवार्चन करेगी, उसी का पुत्र महाभारत के युद्ध में विजयी होगा। माता कुंती यह सुनकर निराश हो गयी, क्योंकि अज्ञातवास के समय उनके पास कुछ भी नहीं था। फिर इतना स्वर्ण कहां से लाती माता कुन्ती की निराशा का कारण जानकर भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन देवराज इन्द्र की वाटिका को गए और वहां से पारिजात वृक्ष की एक डाल को तोड़ कर लाये, उसके स्वर्णमयी आभा वाले पुष्पों से माता कुंती ने प्रथम शिवार्चन किया। पांडवों को विजय श्री मिली यही कारण है कि इसे कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। तत्पश्चात पारिजात वृक्ष की डाल को उन्होंने ग्राम बरोलिया में प्रत्यारोपित कर दिया गंगा दशहरा के समय इसमें स्वर्ण मयी आभा वाले पुष्प आते हैं जो अपनी भीनी-भीनी सुगंध से वातावरण को आच्छादित कर देते हैं।

कुन्तेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना द्वापर काल में माता कुंती ने अपने हाथों से किया था, जहां पर माता कुंती आज भी अपने हाथों से प्रथम शिवार्चन करती है। शाम को मंदिर में चढ़ाई गई सारी सामग्री को हटा दिया जाता है। रात्रि 12 बजे के आसपास कोई अदृश्य शक्ति उक्त स्थान पर पूजा अर्चना करके चली जाती है। जो अपने आप में रहस्य बना हुआ है लोगों की मान्यता है कि यहां पर शिवार्चन करने से लोगों की सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।

पंकज/दीपक

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