संदीप पांडेय
हमारे हिन्दू धर्म मे साल भर में अनेक त्योहार मनाए जाने की परंम्परा है, लेकिन कुछ लोगो को इनके मनाए जाने की वजह की जानकारी नही होती है। आज हम आपको इसी क्रम में बताएंगे कि महाशिवरात्रि क्यों मनाते है और इसका महत्व क्या है? हमारे हिन्दू धर्म मे महाशिवरात्रि को धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा करते हैं। फाल्गुन में आने वाली रात्रि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहा जाता है। श्री शिवमहापुराण के अनुसार जब भगवान नारायण व ब्रह्मा जी में वर्चस्व को लेकर युद्ध हुआ, तब उन दोनों के बीच में एक शिवलिंग प्रगट हुआ। लिंग का दर्शन कर दोनों ने विचार किया कि जो इस लिंग का प्रारम्भ या अन्त का दर्शन कर लेगा, वही पूजनीय होगा। यह सुनकर ब्रह्मा जी हंस स्वरूप में व नारायण सूकर स्वरूप में आकाश व पाताल को गमन किया। ब्रह्माजी जब आकाश की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने ऊपर से केतकी के फूल को आते हुए देख पूछा, कि क्या वह प्रारम्भ से आ रहा है? तब केतकी के फूल ने कहा, कि वह तो मध्य भाग से हज़ारों वर्षों से गिरता चला आ रहा है। ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से नारायण के सामने झूठ बोलने को कहा, कि वह यह गवाही करे, कि ब्रह्मा जी ने इस लिंग का प्रारम्भ खोज लिया है। केतकी फूल को लेकर ब्रह्मा जी भगवान नारायण के पास आए व फूल द्वारा झूठी गवाही भी करवाई। नारायण जी ने इस पर ब्रह्मा जी का पूजन किया, उसी समय उस लिंग से भगवान शिव ने प्रगट होकर क्रोध में भैरव प्रगट कर उसे आज्ञा देकर ब्रह्मा के पांच मुखों में से, जिस मुख ने झूठ बोला उसका छेदन करवा दिया। अन्त में नारायण जी स्तुति पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने ब्रह्मा को अभय दान दिया। जिस दिन यह कार्य हुआ, वह दिन शिवरात्रि के रूप में भगवान शिव की आज्ञानुसार मनाया जाता है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। यही वजह है कि इसे हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महापर्व के रूप में मनाया जाता है। हर चंद्र मास का चौदहवाँ दिन अथवा अमावस्या से पूर्व का एक दिन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक कैलेंडर वर्ष में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से, महाशिवरात्रि, को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जो फरवरी मार्च माह में आती है। इस रात ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य भीतर ऊर्जा का प्राकृतिक रूप से ऊपर की और जाती है। यह एक ऐसा दिन है, जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है। इस समय का उपयोग करने के लिए इस परंपरा में हम एक उत्सव मनाते हैं।
शायद आप यह नही जानते
शिवरात्रि तो साल के हर महीने में आती है लेकिन महाशिवरात्रि सालभर में सिर्फ एक बार ही आती है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 11 मार्च को है। महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए है क्योंकि यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है। शिवभक्त इस दिन व्रत रखकर अपने आराध्य का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। शिव मंदिरों में जलाभिषेक का कार्यक्रम दिन भर चलता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका न तो आदि था और न अंत। बताया जाता है कि शिवलिंग का पता लगाने के लिए ब्रह्माजी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला। एक और कथा यह भी है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिवलिंग विभिन्न 64 जगहों पर प्रकट हुए थे। उनमें से हम सब को मात्र 12 जगह का नाम पता है। इन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं। महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लोग दीपस्तंभ लगाते हैं। दीपस्तंभ इसलिए लगाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें। यह जो मूर्ति है उसका नाम लिंगोभव, यानी जो लिंग से प्रकट हुए थे। ऐसा लिंग जिसकी न तो आदि था और न ही अंत।
ऐसी भी मान्यता है कि महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को, शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु, साधकों के लिए, यह वह दिन है, जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे। वे एक पर्वत की भाँति स्थिर व निश्चल हो गए थे। यौगिक परंपरा में, शिव को किसी देवता की तरह नहीं पूजा जाता। उन्हें आदि गुरु माना जाता है, पहले गुरु, जिनसे ज्ञान उपजा। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के पश्चात्, एक दिन वे पूर्ण रूप से स्थिर हो गए। वही दिन महाशिवरात्रि का था। उनके भीतर की सारी गतिविधियाँ शांत हुईं और वे पूरी तरह से स्थिर हुए, इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।
इसके पीछे की कथाओं को छोड़ दें, तो यौगिक परंपराओं में इस दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक साधक के लिए बहुत सी संभावनाएँ मौजूद होती हैं। आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से होते हुए, आज उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ उन्होंने आपको प्रमाण दे दिया है कि आप जिसे भी जीवन के रूप में जानते हैं, पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं, जिसे आप ब्रह्माण्ड और तारामंडल के रूप में जानते हैं; वह सब केवल एक ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों-करोड़ों रूपों में प्रकट करती है। यह वैज्ञानिक तथ्य प्रत्येक योगी के लिए एक अनुभव से उपजा सत्य है। ‘योगी’ शब्द से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, जिसने अस्तित्व की एकात्मकता को जान लिया है। जब मैं कहता हूँ, ‘योग’, तो मैं किसी विशेष अभ्यास या तंत्र की बात नहीं कर रहा। इस असीम विस्तार को तथा अस्तित्व में एकात्म भाव को जानने की सारी चाह, योग है। महा शिवरात्रि की रात, व्यक्ति को इसी का अनुभव पाने का अवसर देती है। शिवरात्रि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिवस होता है। शिवरात्रि का उत्सव तथा महाशिवरात्रि का उत्सव मनाना ऐसा लगता है मानो हम अंधकार का उत्सव मना रहे हों।
