Tuesday, February 17, 2026
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भीष्म ने युधिष्ठिर को बताया था श्राद्ध कर्म का रहस्य

– हरदोई में गायत्री प्रज्ञा पीठ पर पितरों के श्राद्ध और तर्पण का महापर्व शुरू

हरदोई (हि.स.)। गायत्री प्रज्ञा पीठ की पिहानी पर पितरों के श्राद्ध तर्पण का महापर्व की शुरुआत हो चुकी है। रविवार को एक दर्जनभर से अधिक श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। दस सितंबर को भाद्रपद मास की अंतिम तिथि पूर्णिमा थी। इस दिन से 25 सितंबर तक रोज पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण आदि काम किए जाएंगे। 11 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है।

गायत्री प्रज्ञा पीठ के प्रमुख ट्रस्टी अतुल कपूर ने बताया कि सनातन धर्म में श्राद्ध पक्ष का बहुत अधिक महत्व है। पितृ पक्ष के 15 दिनों में पितरों की पूजा, तर्पण और पिंडदान करने से पितृ देव प्रसन्न होते हैं और उनकी आत्मा को शांति मिलती है। पितृ पक्ष के दौरान पितरों की पूजा और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण या पिंडदान करने की परंपरा निभाई जाती है।

प्रमुख ट्रस्टी अतुल कपूर ने बताया कि हिंदू धर्म में पितृ पक्ष के दौरान पितर देवों को तर्पण, श्राद्ध और उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पितरों की पूजा और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण या पिंडदान करने की परंपरा निभाई जाती है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक पितरों का तर्पण देने और उनकी की आत्मा की शांति के लिए ही पितृपक्ष आता है।

गायत्री प्रज्ञा पीठ के व्यवस्थापक देवेंद्र मिश्र ने बताया कि महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध कर्म का रहस्य बताया था। उन्होंने यह भी बताया था कि श्राद्ध कर्म की शुरुआत कैसे हुई? भीष्म पितामह ने बताया था कि प्राचीन समय में सबसे पहले महर्षि निमि को अत्रि मुनि ने श्राद्ध का ज्ञान दिया था। इसके बाद निमि ऋषि ने श्राद्ध किया और उनके बाद अन्य ऋषियों ने भी श्राद्ध कर्म शुरू कर दिए। इसके बाद श्राद्ध कर्म करने की परंपरा प्रचलित हो गई।

गायत्री प्रज्ञा पीठ पिहानी के ट्रस्टी मृदुल कपूर ने बताया कि शास्त्रों में कहा जाता है कि पृथ्वी पर जीवित व्यक्तियों को किसी भी शुभ कार्य या पूजा करने से पहले अपने पूर्वजों की पूजा जरूर करनी चाहिए। मान्यता है अगर पितृगण प्रसन्न रहते हैं तभी भगवान भी प्रसन्न होते हैं। शास्त्रों में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसका उसके परिवार के सदस्यों द्वारा श्राद्ध कर्म करना बहुत ही जरूरी होता है। अगर विधि-विधान से मृत्यु के बाद परिवार के सदस्यों का तर्पण या पिंडदान न किया जाये तो उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है। पितृगण की पिंडदान न करने पर उसकी आत्मा मृत्यु लोक में भटकती रहती है।

पंडित संदीप शुक्ला ने बताया कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार हर महीने की अमावस्या तिथि पर पितरों की शांति के लिए श्राद्ध किया जा जाता है, लेकिन पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध करने और गया में पिंडदान करने का अलग ही महत्व होता है। पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए पितृपक्ष में उनका श्राद्ध करना चाहिए। अगर किसी परिजन की मृत्यु की सही तारीख पता नहीं है तो आश्विन अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है। पिता की मृत्यु होने पर अष्टमी तिथि और माता की मृत्यु होने पर नवमी तिथि तय की गई है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु किसी दुर्घटना में हुई तो उसका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।

श्राद्ध करने का पहला अधिकार पुत्र को

पंडित नरेश चंद्र मिश्र ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही माता पिता को नरक से मुक्ति दिलाता है इसलिए उसे पुत्र कहते हैं। माता पिता की मृत्यु के बाद पुत्र ही पिंड दान, तर्पण, श्राद्ध आदि करता है। इसके कारण मृतक की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। एक से ज्यादा बेटे होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है। अगर सबसे बड़े बेटे की मृत्यु हो गई हो तो छोटे बेटे को श्राद्ध करने का अधिकार है। यानी घर में जो भी बड़ा भाई हो उसे ही श्राद्ध करना चाहिए।

अम्बरीष

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