अयोध्या(हि.स.)। हमारी अयोध्या अद्भुत, अजेय है, शास्वत और चिरंतन है। सरयू इसकी साक्षी है और माता सरयू स्वयं भी अयोध्या और भारत वर्ष के इतिहास की साक्षी हैं। माता सरयू तंत्र, मंत्र, वेदज्ञों, तत्वज्ञों का आहवान करती है और चेतना के गौरीशंकर युगों-युगों से खींचे चले आते हैं। श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसी दास लिखते हैं कि अवध पुरी मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिशि बह सरयू पावनि। अयोध्या, श्रीराम और राममंदिर की चर्चा सरयू की पावन चर्चा के बिना अधूरी ही है। इसलिए सरयू की उत्पत्ति संबंधित वेद-पुराणोक्त विवरण को जान लेना भी आवश्यक है। अयोध्या का इतिहास हजारों वर्षों के उतार-चढ़ाव का है। जिसकी एकमात्र साक्षी माता सरयू हैं। सरयू नदी श्रीहरि विष्णु के अवतार श्रीराम की साक्षी है, उनकी लीलाओं की द्रष्टा है तो अंत में भगवान के महाप्रस्थान का मार्ग भी है। अयोध्या का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही सरयू का।
एक अन्य जगह पर उल्लेख है कि तीर्थराज प्रयाग पाप धोते-धोते काले पड़ गए और उनका सफेद घोड़ा भी काला हो गया तो वह सरयू स्नान को आए। स्नान करके जब वह बाहर निकले तो उनका रंग और घोड़े का रंग पूर्ववत हो गया था। इसी समय महाराजा उज्जैन विक्रमादित्य आखेट करते अयोध्या तक आ गए थे उन्होंने तीर्थराज प्रयाग युवक को देखकर यह पूछा था कि आप कौन है?
‘कौशल प्राचीन देश सरयू अथवा घाघरा के माध्यम से दो प्रांतों में विभक्त था। उत्तरीय भाग को उत्तर कौशल दक्षिणी भाग को बनौघ कहते थे। फिर इन दोनों के और दो भाग थे।’
(कनिंघम एनसिएंट ज्योग्राफी ऑफ इंडिया, पेज 408)
कोशल सरयू के किनारे धन-धान्यवान देश था, निविष्ट शब्द का प्रयोग करते हुए वाल्मीकि कहते हैं कि यह देश सरयू नदी के दोनों किनारों पर स्थित था।
कोसलो नाम विदित: स्फीतो जनपदो महान।
निविष्ट: सरयूतीरे प्रभुतधनधान्यवान।।
(वाल्मीकि रामायण, आरंभ)
महाराज भगीरथ की तपस्या से गंगा का अवतरण हुआ है तो ऋषि वशिष्ठ की तपस्या से सरयू का प्रादूर्भाव हुआ है। अवध क्षेत्र में यह नदी नेपाल से निकलकर बहराइच आती है, अल्मोड़ा में इसे सरयू कहते हैं। बहराइच जिले में तीस कोस बहकर यह कौड़ियला से अलग होते हुए घाघरा में मिल जाती है। इतिहास के जानकार कहते हैं कि इसे अंग्रेजों ने अपने समय में धारा बदल कर घाघरा में मिला दिया था। पुरानी धारा अब भी छोटी सरयू के नाम से बहराईच से एक मील हटकर बहती है।
कनिघंम लिखते हैं कि प्राचीन अयोध्या नगरी जैसा की रामायणी में लिखा है सरयू नदी के किनारे थी। कहा गया है कि उसका घेर 12 योजन या लगभग 100 मील था। किंतु हमें इसे 12 कोस या 24 मील ही पढ़ना चाहिए। संभव है कि उस प्राचीन नगर को उपवन सहित यह नाप किया गया हो। पश्चिम में गुप्तारघाट से लेकर पूर्व में रामघाट तक की दूरी सीधी छह मील है।
सरस्वती: सरयु: सिंधुरुर्मिभि: महामही रवसायंतु वक्षणी:।
देवी रायो मातर: सूदयित्नो घृतवतपयो मधुमन्नो अर्चत:।।
(ऋग्वेद मंडल, 10, 64, 9)
ऋग्वेद के इस मंडल में सरयू का आहवान सरस्वती और सिंधु के साथ किया गया है और उनसे प्रार्थना की गई है कि यजमान को तेज बल दे और मधुमन घृतवत जल दे।
मार्कण्डेय पाण्डेय/मोहित
