Friday, February 13, 2026
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ब्रह्मांड का ऐसा स्थान जहां से है पाताल लोक जाने का रास्ता

नाग पंचमी पर विशेष

– पाताल लोक से तिलिस्मी नाग कुंड के रास्ते आते-जाते थे नागवंशी

– करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व नागवंशी राजा दानवराज ने करवाया था निर्माण

– नाग वंश की राजधानी कंतित में है ऐतिहासिक नाग कुंड

मीरजापुर (हि.स.)। देवी-देवताओं का निवास स्थल एवं साधु-संतों की तपस्थली विंध्य क्षेत्र में ऐसे कई कूप, तालाब और कुंड हैं जिनकी महत्ता सुनकर आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे। आइए आपको ले चलते हैं नाग कुंड की ओर। विंध्याचल मंदिर से कुछ ही दूरी पर मौजूद कंतित के समीप लाल भैरव मंदिर के ठीक सामने उत्तर दिशा में स्थित दो हजार वर्ष पुराना नाग कुंड ब्रह्मांड का ऐसा स्थान है, जहां से पाताल लोक का रास्ता है। पाताल यानी नागवंशियों की नगरी। पाताल लोक का रास्ता प्राचीन नगरी पंपापुर है, जो वर्तमान में विंध्याचल में है। शास्त्र में वर्णित है कि पंपापुर नागवंशी राजाओं की राजधानी थी। मां विंध्यवासिनी नागवंशी राजाओं की कुल देवी के रूप में पूजी जाती थीं।

मान्यता है कि पाताल लोक से इसी रास्ते नागवंशी आते-जाते थे। कई युगों से प्राचीन विंध्य धरा पर अवस्थित नागकुंड की बावली पांच कुंड के साथ विद्यमान है और पाताल लोक जाने वाले मार्ग को ही नाग कुंड के नाम से जाना जाता है। इसे तिलिस्मी कुंड भी कहा जाता है। लगभग 2200 वर्ष पुराने इस कुंड में स्नान करने से सर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इसका उल्लेख बावन पुराण में भी मिलता है। वर्तमान में विंध्याचल के कंतित को प्राचीन समय में कांतिपुर के नाम से जाना जाता था। करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व कांतिपुर ग्राम के नागकुंड का निर्माण नागवंशी राजा दानवराज ने करवाया था। उस समय विंध्यांचल के आसपास नागवंश का साम्राज्य था। कंतित उनकी राजधानी हुआ करती थी।

मांगने पर नागकुंड से जल में तैरते मिलते थे बर्तन

वामन पुराण के अनुसार राजा की 52 रानियां थीं। उन्हीं के स्नान के लिए राजा ने इस कुंड का निर्माण कराया था। चारों तरफ से नीचे उतरने के लिए 52 सीढ़ियों वाले इस कुंड के बारे में जनचर्चा है कि यात्रियों को पुराने समय में कुंड से याचना करने पर उन्हें उपयोग के बर्तन जल में तैरते मिल जाते थे। जिसे उपयोग कर फिर से कुंड में डाल दिया जाता था। मगर समय के साथ कुंड की यह महिमा समाप्त हो गई।

कुंड के अंदर 52 घाट व पांच कुएं

विंध्य पर्वत और गंगा के संगम स्थल पर जगविख्यात आदिशक्ति जगत जननी मां विंध्यवासिनी मंदिर में पूजा-अर्चना करने के पहले नागवंशी इसी पवित्र कुंड में स्नान करते थे। प्रत्येक ओर से सीढ़ियों का निर्माण कर कुंड के अंदर बावन घाट बनाए गए हैं, इसलिए इसका एक नाम बावन घाट भी है। कुंड में पानी के लिए तलहटी में पांच कुएं हैं, जिससे कुंड में पानी आता रहता है।

नाग पंचमी पर होती है विशेष पूजा अर्चना, मिलता है अक्षय पुण्य

नाग कुंड पर सावन के शुक्ल पक्ष की पंचमी को स्नान करने वाले को अक्षय पुण्य मिलता है। स्थानीय अनुपम महराज का कहना है कि नाग कुंड पर नाग पंचमी पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नाग कुंड के चारों तरफ पत्थर पर नाग की मूर्तियां बनाई गई हैं। नाग पंचमी पर दूर-दूर से दर्शनार्थी नाग कुंड के दर्शन व स्नान के लिए आते हैं।

कमलेश्वर शरण/सियाराम

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