अलवर(हि.स.)। अलवर-जयपुर मार्ग स्थित कुशालगढ़ के पहाड़ों में तपस्या करने वाले महाराज सोमनाथ चिमटी वाले बाबा ने बुधवार सुबह करीब चार बजे देह त्याग दी और ब्रह्मलीन हो गए। बाबा ने सुबह शिवनाथ आश्रम में देह त्यागी। दोपहर बाद बाबा को नम आंखों से श्रद्धालुओं ने समाधि दी। उनका समाधि स्थल भी आश्रम में बनाया गया है। बाबा एक दिन पहले ही बूंदी से आश्रम आये थे। बाबा के निधन की सूचना पर अलवर जिले सहित दिल्ली, जयपुर, भरतपुर, हरियाणा, उत्तरप्रदेश आदि से बड़ी संख्या में श्रद्धालु व साधु-संत बाबा के अंतिम दर्शन करने आश्रम पहुंचे। यहां सुबह से ही भक्तों का तांता लगा रहा। बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं भी बाबा के दर्शन के लिए आश्रम में मौजूद रही। बाबा चिमटी नाथ कई वर्षों से कुशालगढ़ स्थित बंगाली पहाड़ी में तपस्या कर रहे थे।

बाबा के शिष्य शैलेन्द्र नागर उर्फ पीरा ने बताया कि बाबा सोमनाथ के बचपन का नाम नानक सांवरिया था। वह हरियाणा के फिरोजपुर जिले के बिछोर गांव के रहने वाले थे। उनका जन्म फतेहपुर सीकरी में नानेरा में हुआ था। उनके पिता का नाम कन्हैयालाल व माता का नाम रामप्यारी है। बाबा के 4 बच्चे भी है। बाबा को जन्म से ही भक्ति का शौक था। घर में धुना लगा प्रभु की भक्ति करते थे। 30 साल की उम्र में बाबा ने गृहस्थ जीवन त्याग दिया। यही से उनका सन्यासी जीवन प्रारम्भ हुआ।

बाबा सोमनाथ अलवर जिले में सबसे पहले मालाखेड़ा कस्बे के बेरला गांव में करीब 1988 में आए। इसके बाद गरवाजी नागल्हेडी आए। बरौली खेड़ली, श्याम गंगा, शिवपुरी नलदेश्वर, मोटाराडा कुशालगढ़ आदि के बाद फिर यहीं बंगाली पहाड़ी पर उन्होंने तपस्या की।
ग्रामीणों ने बताया महाराज का नाम वैसे सोमनाथ महाराज था लेकिन वह हमेशा अपने साथ चिमटा रखते थे। जिस कारण उनका नाम चिमटी वाले बाबा पड़ गया। कुशालगढ़ के आसपास के क्षेत्र में उन्हें चिमटी वाले बाबा के नाम से जाना जाता है। बाबा एक समय भोजन करते थे।
मौन रहते थे चिमटी वाले बाबा इशारों में करते थे बात
चिमटी वाले बाबा मौन रहते थे। वह श्रद्धालुओं से इशारों में या कागज पर लिखकर बातों का जवाब देते थे। ग्रामीणों ने बताया कि नांगल्हेड़ी में तपस्या करने पर बाबा मौन हो गए। तभी से बाबा लिखकर या इशारों में श्रद्धालुओं से बात करते थे। श्रद्धालु भी उनकी बातें समझ जाते थे। बाबा हर समय शास्त्रों का अध्ययन किया करते थे।
