अजय कुमार शर्मा
आज की पीढ़ी सीता के रूप में रामानंद सागर द्वारा निर्मित और निर्देशित रामायण धारावाहिक की सीता यानी दीपिका चिखलिया की छवि को याद करती है। जबकि चालीस के दशक में सीता का मतलब शोभना समर्थ हुआ करता था। शोभना समर्थ यानी नूतन और तनूजा की मां। वो चालीस के दशक की एक लोकप्रिय नायिका थीं। राम (प्रेम अदीब) के साथ उनकी जोड़ी कुछ ऐसी हिट हुई थी कि घर-घर में राम-सीता के फोटो के रूप में इन दोनों के फोटो लगाए जाते थे और बकायदा पूजा की जाती थी।
इस कारण उन्होंने कुछ समय फिल्मों से रिश्ता तोड़ लिया। वापसी के बाद कई सफल फिल्मों में काम किया। उन्हें पहली बार लोकप्रियता प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म भरत मिलाप (1942) से मिली। विजय भट्ट द्वारा निर्देशित यह फिल्म रामायण के भरत मिलाप कांड पर केंद्रित थी। उनकी अगली फिल्म रामराज्य भी बेहद सफल रही और उनकी सीता की छवि घर-घर में बेहद लोकप्रिय हो गई। रामराज्य अभी भी सबसे अधिक सफल पौराणिक फिल्म मानी जाती है। इसके बाद तो उन्होंने प्रकाश पिक्चर्स की रामबाण, राम विवाह, रामायण आदि में प्रेम अदीब के साथ सीता का अभिनय किया और अपार लोकप्रियता पाई ।
शोभना समर्थ ने अपनी सीता वाली छवि को तोड़ने की कोशिश में पृथ्वीराज के साथ फिल्म नल दमयंती की और किशोर साहू के साथ वीर कुणाल । वीर कुणाल में हीरोइन होते हुए भी उनका चरित्र ग्रे शेड्स लिए हुए था। इस चरित्र में उनके अभिनय की तारीफ तो बहुत हुई , लेकिन यह फिल्म बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुई।
धार्मिक और पौराणिक फिल्मों का निर्माण 1950 में कम होने लगा तो शोभना समर्थ ने अपनी दोनों बेटियों नूतन और तनूजा का करियर बनाने पर ध्यान देना शुरू किया। नूतन को फिल्म हमारी बेटी से लांच किया और तनुजा के लिए फिल्म छबीली बनाई। मोतीलाल के साथ उनका प्रेम का रिश्ता जीवन भर बना रहा और फिल्मी पत्र पत्रिकाओं में इसे लगातार सुर्खियां मिलती रहीं। नौ फरवरी 2000 को शोभना समर्थ हमारे बीच नहीं रहीं।
चलते-चलते
वीर कुणाल फिल्म में शोभना समर्थ ने सम्राट अशोक की पत्नी तिष्यरक्षिता का रोल निभाया था जो अपने सौतेले पुत्र कुणाल से प्रेम करने लगती है। उसकी आंखों की सुंदरता पर आशक्त वह उसे पाना चाहती है और अस्वीकार होने पर वह कुणाल को बंदी बनाकर उसकी आंखें निकलवा देती है। पहले शोभना समर्थ अपनी सीता वाली छवि के चलते यह फिल्म करने से मना कर रही थीं लेकिन किशोर साहू द्वारा यह समझाने पर कि उन्हें पहली बार अभिनय करने का सार्थक मौका मिलेगा वे तैयार हो गईं ।
किशोर साहू उन्हें 20,000 रुपये देना चाहते थे । खैर बात नहीं बनी और यह भूमिका मुबारक ने की। एक अन्य पात्र महारानी कुरुवकी के लिए दुर्गा खोटे का चयन किया गया था। इस फिल्म का उद्घाटन एक दिसंबर 1945 को बंबई के नोवेल्टी थियेटर में हुआ था। ऐसा पहली बार था जब कांग्रेस का कोई बड़ा नेता या कोई प्रभावशाली राजनीतिक हस्ती फिल्म के प्रीमियर में शामिल हुई थी । इस फिल्म का उद्घाटन सरदार वल्लभ भाई पटेल के कर कमलों द्वारा किया गया था।
(लेखक, वरिष्ठ कला-साहित्य समीक्षक हैं।)
