अजय कुमार शर्मा
यूं तो रफी साहब को गुजरे हुए कई दशक हो चुके हैं, लेकिन आज भी संगीत की दुनिया में कहीं न कहीं, प्रसारण के किसी न किसी माध्यम पर उनका कोई न कोई गीत सुनने को अवश्य मिल जाता है। उनका यह जादुई प्रभाव उनके जीवनकाल में तो बरकरार रहा ही उनके न रहने पर भी उनकी लोकप्रियता में कोई कमी आई है, ऐसा लगता नहीं। साठ के दशक में रफी की लोकप्रियता के बारे में भारत के मुख्य न्यायाधीश पी.बी. गजेंद्र गडकर ने एक बार मजाकिया अंदाज में कहा था कि हिंदी फिल्म संगीत पर दो महमूदों ने राज किया था। जाहिर है, एक मोहम्मद रफी और दूसरे तलत महमूद। क्योंकि रफी से पहले तलत महमूद की गायकी ही ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के साथ ही उनको भी बेशुमार शोहरत दिला चुकी थी।
रफी की आवाज को ईश्वरी आवाज कह देना कोई गलत नहीं होगा। उनकी आवाज में गीली मिट्टी जैसा लोच था जिस कारण उनकी आवाज जैसी वे चाहते वैसे ही ढल जाती थी। यही वजह है कि रफी साहब विभिन्न प्रकार के गीत जंगली याहू से लेकर रोमानी गीत, भजनों से लेकर देशभक्ति के तराने, कव्वाली हो या कोई नज़्म या फिर गजल बखूबी गा सकते थे। रफी साहब अपनी इसी विविधता के कारण अपने पूरे कैरियर मैं अनेक ऊंचाइयों को छूते रहे और इसी कारण उनकी गायकी की चमक आज भी कायम है। रफी साहब की आवाज को दुनियाभर में पसंद किए जाने का एक कारण यह भी था कि चाहे वह किसी नायक के लिए गा रहे हों या फिर किसी कॉमेडियन के लिए या फिर किसी चरित्र अभिनेता के लिए वह सब पर अच्छी लगती थी। उनकी आवाज एक पीढ़ी के नायकों की आवाज बन गई थी।
दर्द भरे गीत जो उन्होंने दिलीप कुमार के लिए गाए या मस्ती भरे गीत देवानंद के लिए या दुनिया पर तंज कसते राजकपूर के लिए या फिर प्रेम से भीगे गीत जुबली स्टार राजेंद्र कुमार के लिए, वह उन सब की स्वाभाविक आवाज में गाए हुए ही लगे । रफी साहब ने कभी नहीं चाहा कि वह बस नामी-गिरामी या बड़े अभिनेता के लिए ही गाएंगे। वे तो अपनी आवाज किसी को भी देने के लिए तैयार रहते ,बस धुन अच्छी होनी चाहिए। गीत गाने से पहले वह कभी नहीं पूछते थे कि उसके लिए उनको कितना पैसा दिया जाएगा दिया भी जाएगा या नहीं दिया जाएगा।
उनकी सादगी के कारण उस समय में संगीत क्षेत्र में संघर्षरत अनेकों संगीत निर्देशक और गायकों को एक नया मुकाम हासिल हुआ। आज इस बात की ही बेहद हैरानी होती है कि फिल्मों के बेहद व्यवसायिक और गला काट प्रतियोगिता वाले पेशे में भी उन जैसा सच्चा इंसान कैसे अपना काम बेदाग ढंग से करता रह सका और फिल्म जगत के इतिहास में अपनी अनूठी जगह भी बना सका। रफी साहब जोड़ने का काम करने वालों में थे और यह काम उनके गाए गीत आज भी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। यह उनकी लोकप्रियता का ही कमाल है कि आज भी उनकी स्मृति को जिंदा रखने के काम लगातार हो रहे हैं।
हाल ही में नियोगी बुक्स ने “मोहम्मद रफी : स्वयं ईश्वर की आवाज” शीर्षक से राजू कोरती और धीरेंद्र जैन की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है। अनुवाद प्रख्यात कला समीक्षक,कवि एवं संपादक प्रयाग शुक्ल ने किया है। किताब में बेहद गहराई से रफ़ी साहब के जीवन को खंगाला गया है और बहुत सारी नई जानकारी प्रस्तुत की गई है। नोएडा में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार निर्मेलेंदु “सुहाना सफर” शीर्षक से यूट्यूब पर एक चैनल चलाते हैं जो रफी साहब को समर्पित है, जिसमें वह रफी के विभिन्न गीतों के बारे में नई-नई जानकारी देते हैं। उनकी आवाज भी अच्छी है वह अपनी आवाज में उस गीत को गाकर प्रस्तुति को रोचक भी बनाते हैं।
चलते-चलते: आनंद बक्शी अपने बेटे को बांद्रा के कान्वेंट स्कूल में भर्ती कराना चाहते थे। उन्होंने बड़ी कोशिश की पर सफलता न मिली। किसी ने उन्हें बताया कि रफी साहब ने उस स्कूल को काफी धन दान दिया है। जब उन्होंने रफी साहब से कहा कि वह मदद करें तो बच्चे को स्कूल में एडमिशन मिल सकता है। उनका कहना भर था कि सिफारिश के लिए रफी साहब खुद स्कूल गए और विद्यार्थियों के लिए गाया भी। फिर क्या था आनंद बख्शी के बेटे को एडमिशन तो मिलना ही था।
(लेखक- राष्ट्रीय साहित्य संस्थान के सहायक संपादक हैं। नब्बे के दशक में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए ख्यातिलब्ध रही प्रतिष्ठित पहली हिंदी वीडियो पत्रिका कालचक्र से संबद्ध रहे हैं। साहित्य, संस्कृति और सिनेमा पर पैनी नजर रखते हैं।)
